साइकिल चलाने और पैदल चलने वालों पर पं. भरत उपाध्याय का व्यंग्य, GDP से जोड़कर उठाए सवाल
विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
बगहा। पं. भरत उपाध्याय ने अपने व्यंग्य ‘व्यंग्यबाहुक’ के माध्यम से आधुनिक अर्थव्यवस्था और बदलती जीवनशैली पर चुटीले अंदाज में कटाक्ष किया है। उन्होंने साइकिल चलाने और पैदल चलने को अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह बताने वाली व्यंग्यात्मक टिप्पणी के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया कि आज की उपभोक्तावादी व्यवस्था में लोगों के खर्च को आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता है। पं. उपाध्याय के व्यंग्य के अनुसार, साइकिल चलाने वाला व्यक्ति कार नहीं खरीदता, वाहन के लिए कर्ज नहीं लेता, बीमा नहीं करवाता, पेट्रोल-डीजल पर खर्च नहीं करता और न ही वाहन की सर्विसिंग तथा पार्किंग पर पैसे लगाता है। इसी तरह, स्वस्थ व्यक्ति के अस्पताल और दवाइयों पर कम खर्च करने से स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा उसका खर्च भी कम हो सकता है। उन्होंने फास्ट फूड की दुकानों का उदाहरण देते हुए व्यंग्य किया कि अस्वस्थ जीवनशैली से उत्पन्न बीमारियों के कारण हृदय रोग विशेषज्ञों, दंत चिकित्सकों और वजन घटाने वाले विशेषज्ञों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।

इस टिप्पणी के माध्यम से उन्होंने ऐसी आर्थिक गतिविधियों पर कटाक्ष किया, जो लोगों के अधिक खर्च करने और बीमार पड़ने से भी जुड़ी हो सकती हैं। व्यंग्य के अंत में उन्होंने कहा कि पैदल चलने वाला तो साइकिल भी नहीं खरीदता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था के लिए और भी ज्यादा ‘खतरनाक’ है। व्यंग्य का संदेश: इस रचना के जरिए पं. भरत उपाध्याय ने स्वस्थ जीवनशैली और उपभोक्तावादी सोच के बीच के अंतर को रोचक ढंग से सामने रखा है। हालांकि, यह टिप्पणी व्यंग्यात्मक है; वास्तविक अर्थव्यवस्था में साइकिलिंग और पैदल चलने से स्वास्थ्य, ईंधन की बचत तथा पर्यावरण को लाभ मिलता है।
