रामायण की कथा से जगत का कल्याण होता है -अखिलेश शाण्डिल्य
विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
मधुबनी, स्थानीय भुजौली कालोनी में पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने कथा जो सकल लोक हितकारी के बैनर तले हो रही विशिष्ट कल्याणकारी रामकथा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि -मानस में नाम-वंदना और राम नाम की महिमा जगतके कल्याण हेतु जन-जन तक प्रस्तुत की जाती है।
इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय मानस वक्ता अखिलेश शांडिल्य और छपरा से पधारीं प्रिया प्रियदर्शनी जी का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। आज की दिव्य कथा का कुछ अंश प्रस्तुत है-
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।

चारों युगों, तीनों कालों और तीनों लोकों में नाम जपकर जीव शोक-रहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का भी यही मत है कि समस्त पुण्यों का फल श्रीराम जी के प्रति प्रेम प्राप्त करना है।ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥*
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना। सत्ययुग में ध्यान से, त्रेतायुग में यज्ञ से और द्वापरयुग में भगवान की पूजा से भक्ति प्राप्त होती है। परंतु कलियुग पापों की जड़ और अत्यंत मलिन है। इस युग में मनुष्य का मन पापरूपी समुद्र में मछली के समान है, अर्थात वह पापों से सहज ही अलग नहीं हो पाता।
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥

ऐसे घोर कलियुग में राम नाम ही कल्पवृक्ष के समान है, जो स्मरण करने पर संसार के समस्त जंजालों को दूर करने वाला है। कलियुग में राम नाम मनवांछित फल देने वाला है। यह परलोक में परम हितकारी तथा इस संसार में माता-पिता के समान पालन और रक्षण करने वाला है।
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
कलियुग में कर्म, भक्ति और विवेक का मार्ग कठिन बताया गया है; राम नाम ही एकमात्र आधार है। जिस प्रकार श्रीहनुमान जी कालनेमि के कपट को परास्त करने में समर्थ हैं, उसी प्रकार राम नाम के सहारे मनुष्य कलियुग के कपट और भ्रम से बच सकता है। राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ राम नाम नृसिंह भगवान के समान है, कलियुग हिरण्यकशिपु के समान है और नाम जपने वाले भक्त प्रह्लाद के समान हैं। राम नाम कलियुग रूपी आसुरी प्रभावों को परास्त करके नाम जपने वालों की रक्षा करता है।
भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥ प्रेम-भाव से, बैर-भाव से, क्रोध-भाव से या आलस्य-भाव से—किसी भी प्रकार से नाम जपने पर दसों दिशाओं में मंगलकारी प्रभाव बताया गया है। उसी मंगलकारी राम नाम का स्मरण करके श्रीरघुनाथ जी को मस्तक नवाकर मैं श्रीराम जी के गुणों की गाथा कहता हूँ।
हे प्रभु श्रीराम! आप ही हमारे जीवन के आधार, मार्गदर्शक और रक्षक हैं। हमारे हृदय में सदैव आपका नाम बसा रहे। हमारी बुद्धि को सद्मार्ग दिखाएँ, हमारे कर्मों को पवित्र बनाएँ और हमें सत्य, सेवा, विनम्रता तथा परोपकार के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
