शादमान शकील हैदर बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
बगहा: रहमान नगर निवासी मुफ्ती हुसैन अहमद कासमी ने मोहर्रम के पवित्र महीने की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि इस्लाम में हिजरी साल की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मक्का से मदीना हिजरत की ऐतिहासिक घटना से होती है। इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम अल-हरम होता है, जो चार पवित्र महीनों में से एक है। मुफ्ती कासमी ने बताया कि मुहर्रम, ज़ु अल-क़दाह, ज़ु अल-हिज्जा और रजब को “अशहुर अल-हरम” कहा जाता है, जिन्हें अल्लाह तआला ने विशेष रूप से सम्मानित किया है। इन महीनों में इबादत का सवाब अधिक मिलता है और इन्हें अत्यंत आदर के साथ मनाया जाता है।
उन्होंने विशेष रूप से 10 मुहर्रम, यानी आशूरा के दिन की फजीलत पर जोर देते हुए कहा कि इस दिन का रोज़ा रखना इस्लाम में सुन्नत और अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। हदीस के अनुसार, हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि.) ने बताया कि पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रमज़ान और आशूरा के दिन सबसे अधिक लगन से रोज़ा रखते थे। सही बुखारी की हदीस (नंबर 2006) में इसका उल्लेख मिलता है।
मुफ्ती ने आगे बताया कि आशूरा के दिन रखा गया रोज़ा पिछले एक वर्ष के गुनाहों का कफ्फारा बनता है। हालांकि, इस दिन के रोज़े के साथ इस्लाम में अन्य समुदायों की नकल से बचने की भी शिक्षा दी गई है। उन्होंने कहा कि चूंकि यहूदी भी 10 मुहर्रम को रोज़ा रखते थे, इसलिए पैगंबर ने मुसलमानों को निर्देश दिया कि वे 9 या 11 मुहर्रम का रोज़ा भी इसके साथ रखें, ताकि सुन्नत का पालन करते हुए भिन्नता भी बनी रहे। अंत में मुफ्ती कासमी ने लोगों से अपील की कि वे मोहर्रम के पवित्र महीने में अधिक से अधिक इबादत करें, नेक कामों में हिस्सा लें और आपसी भाईचारे को मजबूत करें।






