आइए आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी धर्म निभाएं!-पं०भरत उपाध्याय
विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
बगहा, पूर्व प्राचार्य एवं प्रख्यात पर्यावरणविद् पंडित भरत उपाध्याय ने दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान नदियों को प्रदूषण से बचाने की चुनौती विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि -मां दुर्गा की आराधना के बाद अब उन्हें विदाई देने की तैयारी है। बुधवार से दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन शुरू होगा।सीधे नदी में प्रतिमा विसर्जन से जल प्रदूषित होता है ऐसे में नदियों को प्रदूषण से बचाना बहुत बड़ी चुनौती है। मां दुर्गा की विदाई श्रद्धा और उल्लास के साथ हो, लेकिन उनकी कृपा की प्रतीक नारायणी पुत्री बांसी की धारा भी निर्मल बनी रहे यह सुनिश्चित करना जरूरी है।
प्रतिमाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पीओपी को पानी में घुलने में काफी समय लग सकता है, वहीं कुछ प्रतिमाओं पर लगाए जाने वाले रासायनिक रंगों में मौजूद हानिकारक तत्व एवं विषैले पदार्थ नदी के पानी की गुणवत्ता और जलीय जीवों को प्रभावित कर सकते हैं। विसर्जन के साथ फूल, माला, कपड़े, सजावटी सामग्री और अन्य पूजन सामग्री भी नदी में पहुंचती है, जिससे प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर केवल नदी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पानी पर निर्भर जीव जंतुओं और आसपास के पर्यावरण पर भी पड़ सकता है। इसलिए आयोजक मंडल आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी धर्म निभाएं।
स्मरणीय है कि दो, तीन दशक पूर्व पूरे जिले में जितनी मूर्तियों की संख्या रहती थी , आज उससे अधिक संख्या में किसी एक चौक-चौराहे पर दिखाई पड़ रहीं हैं। मूर्तियों के विषय में शासन-प्रशासन को स्वंय सही संख्या ज्ञात नहीं है।उनकी नजर सिर्फ चौक व बाजार तक है। गांव व गली-मोहल्लों का आंकड़ा किसी के पास नहीं है।
गुरु जी ने आगे कहा कि मां दुर्गा की विदाई केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी है! इसके लिए समाज के जागरूक लोगों को अन्य विकल्प, जैसे पोखरा, तालाब,नहर आदि में मूर्ति विसर्जन कराना चाहिए। शास्त्रों में मूर्ति विसर्जन का उद्देश्य मिट्टी को मिट्टी में मिला देना है।
