नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की-पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार



रात के ठीक बारह बजे थे। मथुरा की कालकोठरी में घुप अंधेरा था और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। देवकी और वासुदेव दोनों डरे हुए थे, क्योंकि कंस को जैसे ही खबर लगती, वह बच्चे को मारने दौड़ा चला आता। उनके सात बच्चों के साथ पहले भी यही हो चुका था। अब सवाल यह था कि क्या यह आठवां बच्चा बच पाएगा?
तभी अचानक उस अंधेरी कोठरी में एक तेज रोशनी फैली और नन्हे कृष्ण ने जन्म लिया। बच्चे का चेहरा इतना मनमोहक था कि दोनों सब दुख भूल गए। मगर जान बचाने का समय बहुत कम था। वासुदेव ने सोचा कि इसे तुरंत यहां से निकालना होगा, पर निकलें कैसे? हाथों-पैरों में लोहे की भारी बेड़ियां थीं, दरवाजे पर बड़े-बड़े ताले लटके थे और बाहर हथियारबंद पहरेदार खड़े थे।
वासुदेव ने जैसे ही बच्चे को सूप में रखा, एक अजूबा हुआ। हाथों की बेड़ियां अपने आप खुल गईं। वासुदेव डरते-डरते दरवाजे की तरफ बढ़े, तो ताले अपने आप टूट गए और भारी फाटक खुलते चले गए। बाहर देखा तो सारे पहरेदार ऐसे सो रहे थे जैसे किसी ने उन पर जादू कर दिया हो। वासुदेव बच्चे को सिर पर उठाकर चुपचाप बाहर निकल आए।


लेकिन असली आफत तो अब सामने थी। यमुना नदी उफान पर थी। पानी इतना तेज बह रहा था कि बड़े-बड़े पेड़ बह जाएं। वासुदेव ने सोचा—आगे बढ़ूं तो डूबने का डर, पीछे लौटूं तो कंस का खंजर! अब क्या करें? उन्होंने हिम्मत जुटाई और कान्हा का नाम लेकर नदी में उतर गए। पानी पहले घुटनों तक आया, फिर कमर तक और देखते ही देखते वासुदेव के गले तक पहुँच गया। पानी टोकरी को छूने लगा और वासुदेव घबरा गए कि कहीं बच्चा डूब न जाए!
तभी टोकरी में लेटे नन्हे कृष्ण ने अपना एक पैर बाहर निकाला। जैसे ही उनके पैर का अंगूठा यमुना के पानी से छुआ, नदी का उफान एकदम शांत हो गया और पानी कम होने लगा। रास्ता साफ हो गया और वासुदेव सुरक्षित नदी पार कर गए। सामने गोकुल गांव दिख रहा था, जहां नंद बाबा का घर था। वासुदेव ने चैन की सांस ली, पर दिल में धड़कन अभी भी तेज थी, धीमे कदमों से वासुदेव नंद बाबा के आंगन में दाखिल हुए। चारों तरफ गहरा सन्नाटा था, हर कोई गहरी नींद में डूबा हुआ था। मैया यशोदा भी थकी-हारी सो रही थीं और उनके बगल में एक नवजात कन्या लेटी थी। वासुदेव ने कांपते हाथों से नन्हे कृष्ण को यशोदा की गोद में लिटा दिया और उस नन्हीं कन्या को उठाकर भारी मन से वापस मथुरा की ओर लौट पड़े।


सुबह की पहली किरण फूटते ही गोकुल का कोना-कोना खिल उठा। यशोदा की आंख खुली तो सामने सांवली सलोनी सूरत वाला मनमोहक ललना मुस्कुरा रहा था। देखते ही देखते पूरे ब्रज में यह खबर आग की तरह फैल गई। ढोल-नगाड़े बजने लगे, गोप-ग्वाले खुशी से नाचने लगे और हर तरफ एक ही जयकारा गूंज उठा—”नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!” कंस का अत्याचार और पाप का वह काला साम्राज्य उस एक मुस्कान के आगे उसी रात बिखरने लगा था। जहां भगवान होते हैं, वहां डर, विपत्ति और बंधनों की कोई औकात नहीं रह जाती। कृष्ण का यह अवतरण हमें यही भरोसा देता है कि जीवन की रात कितनी भी अंधेरी हो और मुसीबतें यमुना की तरह कितनी भी उफान पर क्यों न हों, जब विश्वास का कान्हा साथ होता है तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं!!

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