वाल्मीकि नगर से नंदलाल पटेल की रिपोर्ट
24 घंटे अखंड राम नाम संकीर्तन और भंडारे को लेकर रविवार को थारू समुदाय की ओर से भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इसमें 251 कन्याओं ने माथे पर कलश रखकर नारायणी नदी से जल भरा और गाजे-बाजे के साथ जटाशंकर धाम पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत की। कलश यात्रा में थारू समुदाय की महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ लोक भजन और कीर्तन करते हुए शामिल हुए। मंदिर परिसर से शुरू हुई यात्रा नारायणी के संगम तट स्थित कालेश्वर मंदिर परिसर तक पहुंची। इस दौरान भजन-कीर्तन और राम नाम के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। पारंपरिक लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था के इस अनूठे संगम ने श्रद्धालुओं का विशेष आकर्षण खींचा।

जिला परिषद अध्यक्ष निर्भय कुमार महतो की पहल पर रविवार से 24 घंटे अखंड राम नाम संकीर्तन की शुरुआत की गई। आयोजन में जिला परिषद क्षेत्र संख्या चार के सदस्य बृज बिहारी यादव, पूर्व मुखिया राजलाल महतो, ईडीसी अध्यक्ष संतोष काजी, थारू कल्याण महासंघ के पूर्व अध्यक्ष महेश्वर काजी, पूर्व सरपंच जगदीश सोखईत सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, स्थानीय नागरिक और श्रद्धालु शामिल हुए। सावन में हर साल होता है धार्मिक आयोजन आयोजनकर्ता जिप अध्यक्ष निर्भय कुमार महतो ने बताया कि सावन के महीने में थारू समुदाय की ओर से हर साल सार्वजनिक रूप से इस धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया जाता रहा है। इस वर्ष उन्होंने स्वयं आयोजन की जिम्मेदारी ली है। उन्होंने कहा कि आयोजन में सभी का सहयोग मिल रहा है, जबकि यज्ञ में होने वाले खर्च का वहन वे स्वयं करेंगे।

जटाशंकर धाम पहुंचने वाले कांवरियों और श्रद्धालुओं के लिए मंदिर परिसर स्थित धर्मशाला को व्यवस्थित किया गया है। यहां आने वाले शिव भक्तों के लिए महाप्रसाद और 24 घंटे भंडारे की व्यवस्था की गई है। अखंड राम नाम संकीर्तन की पूर्णाहुति सावन की दूसरी सोमवारी की शाम होगी।
थारू समाज की आस्था का केंद्र है जटाशंकर धाम
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच स्थित जटाशंकर धाम के धार्मिक और सामाजिक विकास में थारू समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मंदिर की देखरेख से लेकर श्रद्धालुओं के ठहरने, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं तक में समुदाय के लोग सक्रिय रहते हैं। सावन में होने वाला अखंड राम नाम संकीर्तन भी लंबे समय से थारू समाज की धार्मिक परंपरा का हिस्सा रहा है। मंदिर के महंत की नियुक्ति सहित कई व्यवस्थाओं में भी समुदाय की भूमिका रहती है। इस कारण जटाशंकर धाम थारू समाज की आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकजुटता का प्रमुख केंद्र माना जाता है।






