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आत्मबल से सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति-पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार



मेरिका यात्रा के दौरान जब स्वामी विवेकानंद को बोलने की अनुमति नहीं मिली तो वे निराश नहीं हुए। उन्होंने दृढ़ मनोबल से अपने लिए अनुमति प्राप्त कर ही ली। उसके बाद क्या हुआ, यह पूरी दुनिया जानती है। मनोबल ऐसा मानवीय गुण है जो हमें हर संकट से निकलने और जीवन को सफल बनाने में मददगार बनता है। लेकिन उसके साथ आत्मबल का होना जरूरी है।
एक कहावत है कि किसी भी लक्ष्य की सफलता में तब तक हताश नहीं होना चाहिए जब तक सफलता न मिल जाए। इसका सीधा संकेत है कि कठिन से कठिन लक्ष्य की प्राप्ति भी मनोबल और आत्मबल से प्राप्त की जा सकती है। आज अगर दुख व अशांति का प्रभाव ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारा मन छोटा हो गया है।

जाहिर है मन छोटा होगा तो सुख भी छोटा ही होगा और लक्ष्य भी छोटा ही होगा।
हमारे ऋषी-मुनियों, सच्चे गुरुओं ने तो शुरू से ही इस मन को विराट बनाने के अभ्यास की खोज की है। अगर भीतर प्रेम-निर्झर नहीं बह रहा है या सच्ची प्रीति-पूर्ण सहयोग का भाव नहीं है तो समझो कि हमारा पूरा अस्तित्व ही गड़बड़ा जाएगा। सच्चे प्रेम से पूरी दुनिया का हृदय जीतकर जो सुख-शांति व आनंद मिलता है, वह किसी को हराने में नहीं मिल सकता।
आत्मबल अंदर से ताकतवर बनाता है और मनोबल बाहरी संघर्ष के लिए तैयार करता है। हमारा मन ही हमें संचालित करता है। उसमें आत्मबल भरने की जिम्मेदारी भी हमारी है। लेकिन मन को साधकर अति चंचल होने से बचाना होगा। यह मन की अति चंचलता हमें अश्व गति से ले भागती है और हम सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए ध्यान के अभ्यास से मन को स्वांसो के साथ एकाकार करके स्वयं को जानो और परमानंद के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल बनाओ।

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