Friday, June 5, 2026
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मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा; केवीके माधोपुर में जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

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मिट्टी की सेहत पर मंडरा रहा संकट, अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग पर वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

अनिल कुमार शर्मा मझौलिया पश्चिम चंपारण।

देश में बढ़ते रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग ने मिट्टी की सेहत को गंभीर संकट की ओर धकेल दिया है। हाल के आकलनों के अनुसार भारत की लगभग 64 प्रतिशत मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी पाई गई है, जबकि करीब 48.5 प्रतिशत मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर कम है। कई राज्यों में मिट्टी के नमूनों में जैविक कार्बन की कमी 80 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है, जो कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता के लिए चिंता का विषय है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में प्रति हेक्टेयर उर्वरक खपत लगातार बढ़ रही है, जबकि मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा कई क्षेत्रों में अनुशंसित स्तर 0.75 प्रतिशत से भी कम रह गई है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी की उत्पादकता, पोषक तत्वों की उपलब्धता और जल धारण क्षमता प्रभावित हो रही है। इसी चुनौती से निपटने के लिए गुरुवार को कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), माधोपुर में भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (इफको) के सहयोग से ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत जिले के कृषि आदान (इनपुट) विक्रेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कृषि क्षेत्र में बढ़ते रासायनिक इनपुट के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरणीय संतुलन तथा मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखते हुए आज कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), माधोपुर में भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (इफको) के सहयोग से “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए उर्वरक एवं कृषि आदान (इनपुट) विक्रेताओं, कृषि पदाधिकारियों, वैज्ञानिकों एवं कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों तक सही तकनीकी जानकारी पहुंचाने वाले कृषि आदान विक्रेताओं को संतुलित उर्वरक उपयोग, सुरक्षित कीटनाशक प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना था, ताकि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भूमि की उत्पादकता और पर्यावरणीय संतुलन को भी सुरक्षित रखा जा सके।
कार्यक्रम में पश्चिम चंपारण के जिला कृषि पदाधिकारी (DAO) श्री सरफराज असगर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ इफको के राज्य विपणन प्रबंधक (State Marketing Officer) श्री आनंद कुमार श्रीवास्तव, कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह तथा पौधा संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. सौरभ दुबे एव इफको के क्षेत्रीय क्षेत्र पदाधिकारी श्री सुजीत कुमार मंचासीन रहे।
अपने संबोधन में जिला कृषि पदाधिकारी श्री सरफराज असगर ने कहा कि कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि बिहार सहित देश के कई क्षेत्रों में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों, विशेषकर यूरिया का असंतुलित उपयोग एक गंभीर चुनौती बन चुका है। इससे फसल उत्पादन की लागत बढ़ती है तथा मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्पन्न हो जाती है। उन्होंने कृषि आदान विक्रेताओं से आग्रह किया कि वे किसानों को केवल उर्वरक बेचने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक सलाह देकर सही मात्रा एवं सही समय पर उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित करें।
इफको के राज्य विपणन प्रबंधक श्री आनंद कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि भारत सरकार एवं सहकारी संस्थाएं संतुलित पोषण प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। उन्होंने बताया कि देश में प्रति वर्ष करोड़ों टन रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है, लेकिन कई क्षेत्रों में एनपीके (NPK) अनुपात अभी भी अनुशंसित स्तर से काफी असंतुलित है। उन्होंने नैनो यूरिया, नैनो डीएपी तथा आधुनिक उर्वरक प्रबंधन तकनीकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन तकनीकों के माध्यम से उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सकती है तथा लागत में कमी लाई जा सकती है।
कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही समृद्ध कृषि की आधारशिला है। उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तथा विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के अध्ययन दर्शाते हैं कि लगातार असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा घट रही है, जिसके कारण भूमि की जल धारण क्षमता एवं पोषक तत्व उपलब्ध कराने की क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने किसानों एवं कृषि आदान विक्रेताओं से मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया।


डॉ. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में केवल उत्पादन बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता, मिट्टी का स्वास्थ्य, जल संरक्षण तथा पर्यावरणीय सुरक्षा को भी समान महत्व देना होगा। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन, जैविक खादों का उपयोग, हरी खाद, जैव उर्वरक तथा फसल चक्र अपनाने से मिट्टी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए पौधा संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. सौरभ दुबे ने कीटनाशकों के वैज्ञानिक एवं सुरक्षित उपयोग पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विश्व स्तर पर किए गए अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि आवश्यकता से अधिक एवं अनुचित कीटनाशक उपयोग से मिट्टी की जैविक गतिविधियां प्रभावित होती हैं तथा लाभकारी कीटों की संख्या में कमी आती है। इसके अतिरिक्त फसलों में कीटनाशक अवशेषों की मात्रा बढ़ने से मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. दुबे ने कहा कि समेकित कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management – IPM) वर्तमान समय की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत जैविक नियंत्रण, फेरोमोन ट्रैप, प्रकाश प्रपंच, यांत्रिक नियंत्रण तथा आवश्यकता पड़ने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने इनपुट विक्रेताओं को कीटनाशक बिक्री के दौरान किसानों को सही सलाह देने, अनुशंसित मात्रा बताने तथा सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी निभाने का आग्रह किया।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में कुल कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार के मृदा क्षरण, पोषक तत्व असंतुलन तथा जैविक कार्बन की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। ऐसे में संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक पदार्थों की बढ़ोतरी तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की मांग है।
कार्यक्रम में उपस्थित कृषि आदान विक्रेताओं को उर्वरक एवं कीटनाशक प्रबंधन से संबंधित नवीनतम दिशा-निर्देशों, लाइसेंसधारियों की जिम्मेदारियों, कृषि विभाग की योजनाओं तथा किसानों तक वैज्ञानिक संदेश पहुंचाने की रणनीतियों की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि कृषि आदान विक्रेता किसानों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं, इसलिए उनकी भूमिका कृषि विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस अवसर पर प्रतिभागियों ने मृदा स्वास्थ्य, कीटनाशक अवशेष, जैविक कृषि, नैनो उर्वरकों, फसल पोषण प्रबंधन तथा कृषि लागत में कमी से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों द्वारा विस्तारपूर्वक समाधान किया गया।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने “खेत बचाओ, मिट्टी बचाओ, पर्यावरण बचाओ और स्वस्थ भविष्य बनाओ” के संकल्प के साथ संतुलित उर्वरक एवं कीटनाशक उपयोग को बढ़ावा देने तथा किसानों के बीच वैज्ञानिक खेती के संदेश को पहुंचाने का संकल्प लिया।
विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर, कृषि विभाग, इफको तथा कृषि आदान विक्रेताओं के संयुक्त प्रयासों से पश्चिम चंपारण जिले में टिकाऊ कृषि, स्वस्थ मिट्टी तथा सुरक्षित खाद्य उत्पादन को नई दिशा मिलेगी
विशेषज्ञों ने बताया कि कृषि आदान विक्रेता किसानों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं, इसलिए उनकी भूमिका कृषि विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस अवसर पर प्रतिभागियों ने मृदा स्वास्थ्य, कीटनाशक अवशेष, जैविक कृषि, नैनो उर्वरकों, फसल पोषण प्रबंधन तथा कृषि लागत में कमी से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों द्वारा विस्तारपूर्वक समाधान किया गया।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने “खेत बचाओ, मिट्टी बचाओ, पर्यावरण बचाओ और स्वस्थ भविष्य बनाओ” के संकल्प के साथ संतुलित उर्वरक एवं कीटनाशक उपयोग को बढ़ावा देने तथा किसानों के बीच वैज्ञानिक खेती के संदेश को पहुंचाने का संकल्प लिया।
विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर, कृषि विभाग, इफको तथा कृषि आदान विक्रेताओं के संयुक्त प्रयासों से पश्चिम चंपारण जिले में टिकाऊ कृषि, स्वस्थ मिट्टी तथा सुरक्षित खाद्य उत्पादन को नई दिशा मिलेगी।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पैक्स अध्यक्ष शत्रुघन कुमार सिंह सुनील कुमार सिंह दया निधि पांडे लालटुन पांडे विजय कुमार गुप्ता छोटेलाल प्रसाद अशोक कुमार मनीष कुमार महताब आलम नारद सिंह सिपाही प्रसाद विकास कुमार पांडे अभिनव कुमार कमलेश सिंह मिथिलेश पांडे आदि उपस्थित थे।

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