मलकौली-पठखौली की अनूठी परंपरा: मिठाई की मिठास और पान की लाली से मजबूत होते हैं रिश्ते

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विजयदशमी की संध्या पर घर-घर होता है अतिथियों का स्वागत

गिले-शिकवे भुलाकर प्रेम, मित्रता और भाईचारे को प्रगाढ़ करने की अनोखी पहल

विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार

बगहा। आधुनिकता और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच आज भी मलकौली-पठखौली में विजयदशमी के अवसर पर एक ऐसी अनूठी परंपरा जीवंत है, जो आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश देती है। यहां दशहरा की संध्या पर घर-घर मिठाई और पान से अतिथियों का स्वागत किया जाता है। मिठाई से मुंह मीठा कराने और पान खिलाकर होठों की लाली बरकरार रखने की यह परंपरा सामाजिक संबंधों में मिठास घोलने का माध्यम बनी हुई है। पान को संस्कृत में ‘तांबूल’ कहा जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों और देवी-देवताओं के पूजन में तांबूल अर्पित करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। लेकिन मलकौली- पठखौली में विजयदशमी के दिन पान खिलाने की परंपरा का सामाजिक महत्व विशेष है। इसका उद्देश्य केवल अतिथियों का स्वागत करना नहीं, बल्कि आपसी मनमुटाव दूर करना, पुराने गिले-शिकवों को भुलाना और मित्रता व भाईचारे के रिश्तों को नई मजबूती देना है।

विजयदशमी की संध्या होते ही लोग अपने घरों के सामने मिठाइयों की थाल और सजे-संवरे पान के बीड़े लेकर अतिथियों के स्वागत के लिए तैयार रहते हैं। इस दौरान छोटे-बड़े, युवा और बुजुर्ग सभी एक-दूसरे के घर पहुंचते हैं। अतिथियों का आदर-सत्कार किया जाता है, उन्हें मिठाई खिलाकर मुंह मीठा कराया जाता है और विदाई के समय पान खिलाकर उनके चेहरे की चमक तथा मुस्कान हमेशा बरकरार रहने की मंगलकामना की जाती है। नैतिक जागरण मंच वेलफेयर ट्रस्ट के सचिव, समाजसेवी एवं पर्यावरण प्रेमी निप्पू कुमार पाठक इस परंपरा को सामाजिक एकता का महत्वपूर्ण प्रतीक मानते हैं। उनका कहना है कि हमारे पूर्वज दूरदर्शी थे। शायद उन्हें पहले ही एहसास था कि भविष्य में लोग मोबाइल, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप की दुनिया में इतने व्यस्त हो जाएंगे कि आपसी मेल-मिलाप के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में दशहरा जैसे त्योहार लोगों को एक-दूसरे से मिलने, बातचीत करने और संबंधों में आई खटास दूर करने का अवसर देते हैं।

उन्होंने कहा कि इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें उम्र, पद और प्रतिष्ठा का कोई भेद नहीं रहता। हर व्यक्ति एक-दूसरे के घर जाकर प्रेमपूर्वक मिलता है और मिठाई व पान के माध्यम से आत्मीयता व्यक्त करता है मलकौली- पठखौली की यह परंपरा संदेश देती है कि त्योहारों की असली खुशी केवल उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि टूटते संबंधों को जोड़ने, मन की दूरियां मिटाने और समाज में प्रेम व भाईचारे की मिठास बनाए रखने में है।

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