अनिल कुमार शर्मा मझौलिया पश्चिम चंपारण, बिहार
पश्चिम चम्पारण: अमरूद की खेती में अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता केवल खाद एवं सिंचाई पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वैज्ञानिक प्रूनिंग, संतुलित छत्रक (कैनोपी) प्रबंधन एवं फ्रूट बैगिंग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इन तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल उत्पादन बढ़ा सकते हैं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले फल प्राप्त कर बाजार में बेहतर मूल्य भी हासिल कर सकते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने बताया कि पौधे के शुरुआती 1–1.5 वर्षों में सही ढंग से छत्रक प्रबंधन करने से भविष्य में पौधा मजबूत बनता है और 2–3 वर्षों बाद बेहतर उत्पादन देने लगता है। उन्होंने कहा कि शाखाओं पर बनने वाली ‘रिंग’ की सही पहचान सफल प्रूनिंग की कुंजी है। रिंग के नीचे कट लगाने से संतुलित एवं मजबूत छत्रक विकसित होता है, जबकि रिंग के ऊपर कट लगाने से अत्यधिक शाखाएं निकलने के कारण पौधे में घनत्व बढ़ जाता है और रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।

पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. सौरभ दुबे ने बताया कि अमरूद में प्रूनिंग का सबसे उपयुक्त समय फल तुड़ाई के बाद जुलाई के अंत से अगस्त माह तक होता है। इस दौरान सूखी, रोगग्रस्त, टूटी एवं आपस में रगड़ खाने वाली शाखाओं को हटाने से पौधों में प्रकाश और वायु का बेहतर संचार होता है तथा नई स्वस्थ बढ़वार को बढ़ावा मिलता है।
उन्होंने किसानों को फ्रूट बैगिंग अपनाने की भी सलाह दी। मटर के दाने के आकार के फल को अखबारी या पारदर्शी बैग से ढकने पर फल मक्खी, फल छेदक एवं दाग-धब्बों से बचाव होता है। इससे फल आकर्षक, चमकदार एवं बेहतर गुणवत्ता के बनते हैं, जिन्हें बाजार में सामान्य फलों की तुलना में 20–30 प्रतिशत अधिक मूल्य प्राप्त हो सकता है। ।विशेषज्ञों के अनुसार, सही समय पर प्रूनिंग, संतुलित छत्रक प्रबंधन और फ्रूट बैगिंग जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर अमरूद के बागों से लंबे समय तक उच्च गुणवत्ता वाले फल एवं निरंतर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।






