विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
प्रायोजित होली मिलन समारोहों के चकाचौंध और शोरगुल से अलग, पारंपरिक होली की अस्मिता और पवित्रता के संरक्षण में जुटा एक अनूठा पर्यावरण प्रेमी इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रकृति के साथ सहअस्तित्व को अपना ध्येय मानने वाले गजेन्द्र यादव ने पेड़-पौधों, पुष्प-लताओं और उनमें बसेरा बनाए पंछी-परिंदों को ही अपना परिवार मान लिया है। वृक्षारोपण जिनका इष्ट है तथा उनका संरक्षण और पर्यावरण का संवर्धन जिनका अभिष्ट, ऐसे गजेन्द्र यादव वर्षों से प्रकृति के सान्निध्य में ही होली, दीपावली और रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहार मनाते आ रहे हैं।

विगत वर्षों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2026 में भी होली की पूर्व संध्या पर विकास वैभव चौराहे पर वृक्षों के साथ होली मिलन का अनोखा आयोजन किया गया। इस दृश्य को देखकर किसी का भी मन नैसर्गिक आनंद से सराबोर हो उठे, यह स्वाभाविक है। पतझड़ की विरक्ति से उबर कर प्रकृति ने हरितिमा का जो नव परिधान धारण किया है, उसमें खिले रंग-बिरंगे फूल और बेल-बूटे मानो उत्सव की छटा बिखेर रहे हों। आम्रमंजरियों की मादक सुगंध से वातावरण सुवासित और मदमस्त हो उठा।

गांव-गांव से आए युवा, बाल-वृद्ध तथा होरी गीत गाती माताओं और बहनों ने वृक्षों पर गुलाल लगाकर और उनके इर्द-गिर्द नृत्य-गान कर इस होली मिलन को जीवंत बना दिया। प्रकृति का आंचल आज मानो झूम-झूम कर लहरा रहा था। ढोल-मजीरे की थाप पर युवाओं की टोलियां चौताल, उलारा, जोगीरा, बिरहा और बारहमासा की स्वरलहरियों से वातावरण को उल्लास और उमंग से भर रही थीं। दृश्य अत्यंत मनोरम और मनभावन था।

इस अवसर पर सर्वश्री शंभूनाथ शुक्ल, रामसकल साह, कमलेश चतुर्वेदी, पूर्व सेना नायक आदित्य कुमार द्विवेदी, एकबाली यादव, रमेश प्रसाद फौजी, श्रवण राम, गनेश पासवान, योगेंद्र राम, संदीप यादव, भिखम यादव, रूदल चौधरी, आदित्य कुमार, नरेश यादव, मोहन चौधरी, मंटू पटेल, कफील अहमद, विशाल कुमार, राहुल कुमार, रामायन पासवान, हरिशंकर राजभर, नारायण राजभर, नरेश राजभर, आकाश पासवान, चंदन पंडित, मनोज बीन, दीपक बीन, पप्पू साह, राजदेव खटीक, विकास कुमार, अंगद यादव, चंदन कुमार यादव, गुड्डू कुमार सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को और भी सुखद, सरस और प्रेरणादायी बना दिया।

यह आयोजन न केवल पारंपरिक होली की आत्मा को जीवंत करता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश भी देता है—कि यदि हम प्रकृति को परिवार मान लें, तो हर उत्सव अपने आप में अधिक पवित्र, अधिक आनंदमय और अधिक सार्थक हो उठे।






