विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
मधुबनी। पितृपक्ष भारतीय सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का विशेष अवसर है। इस दौरान तर्पण और पिंडदान के माध्यम से पितरों के प्रति अपनी आस्था प्रकट की जाती है। इसी क्रम में पूर्व प्राचार्य पं. भरत उपाध्याय ने पितृपक्ष के महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पितृपक्ष में पितर अपनी संतानों के द्वार पर आस लगाए खड़े रहते हैं, ताकि उनके वंशज श्रद्धापूर्वक तर्पण कर उन्हें तृप्ति प्रदान करें।पं. उपाध्याय ने कहा कि मनुस्मृति में तर्पण को पितृ-यज्ञ के रूप में बताया गया है। सुख-संतोष की वृद्धि और दिवंगत आत्माओं की तृप्ति के उद्देश्य से तर्पण एवं पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है। तर्पण का अर्थ अपने पूर्वजों का आवाहन, सम्मान और श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करना है। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम भी है।उन्होंने बताया कि तर्पण के दौरान जल में दूध, जौ, चावल, तिल, चंदन और पुष्प आदि मिलाकर कुश के सहारे मंत्रोच्चार के साथ जल अर्पित किया जाता है। जब यह जलांजलि श्रद्धा, प्रेम, सद्भावना, कृतज्ञता और शुभकामनाओं की भावना से दी जाती है, तभी तर्पण का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है।

पं. उपाध्याय के अनुसार, सामान्यतः पितृ तर्पण पूर्वजों के परलोक गमन की तिथि के अनुसार किया जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती, वे आश्विन कृष्ण अमावस्या, अर्थात सर्वपितृमोक्ष अमावस्या के दिन तर्पण और श्राद्ध करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। उन्होंने श्राद्ध परंपरा में तर्पण के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा कि देवतर्पण, ऋषितर्पण, दिव्य मानव तर्पण और मनुष्य-पितृ तर्पण सहित विभिन्न तर्पण कर्मों के माध्यम से देवताओं, ऋषियों, पूर्वजों और अपने निकट संबंधियों के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। मनुष्य-पितृ तर्पण के अंतर्गत परिवार के सदस्यों, निकट संबंधियों, गुरु, गुरु-पत्नी, शिष्य और मित्रों के प्रति भी सम्मान का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि तर्पण के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर सद्भावना, विनम्रता और कृतज्ञता जैसे गुणों को जागृत करता है। यही भाव आगे चलकर सत्प्रवृत्तियों का रूप लेते हैं और जीवन को सही दिशा देने में सहायक बनते हैं। पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों, पारिवारिक संस्कारों और पूर्वजों के योगदान को याद करने का संदेश देता है।






