रमेश ठाकुर, विशेष संवाददाता | रामनगर, पश्चिमी चंपारण
नई दिल्ली। भारत में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव व्यवस्था को लोकतंत्र की बुनियाद माना जाता है। इसी संदर्भ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव एवं पूर्व सांसद एम. ए. बेबी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित किए जाने की मांग की है।एम. ए. बेबी का कहना है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को लेकर उसकी भूमिका सार्वजनिक रूप से स्पष्ट दिखाई देती थी। उनका आरोप है कि मौजूदा दौर में आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं और इनका जवाब सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए। उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी चिंता जताई। उनके अनुसार बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के मामलों की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि पात्र मतदाताओं के नाम किसी कारण से सूची से बाहर हो जाते हैं, तो उन्हें अपील और सत्यापन की सरल एवं पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से शीघ्र पुनः शामिल किया जाना चाहिए।

आलेख में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के भीतर ही कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर चुनाव आयुक्तों द्वारा आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। इसमें मतदाता पंजीकरण फॉर्म में किए गए बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकरण तथा पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटाए गए नामों से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। लेख में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इनमें से कई मामलों में अपील लंबित रहने की बात भी कही गई है। लेखक के अनुसार, जिन निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक रही, वहां चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी मतदाता के नाम हटने और उसके संभावित मतदान व्यवहार के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।एम. ए. बेबी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था का निर्देश दिया गया था, जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती।

आलेख में आरोप लगाया गया है कि बाद में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून से नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका बढ़ गई और विपक्ष की भूमिका सीमित हो गई। लेखक के अनुसार चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में व्यापक सहमति और पारदर्शिता जरूरी है। एम. ए. बेबी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने एसआईआर की प्रक्रिया की समीक्षा, पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अधिक पारदर्शी व्यवस्था बनाने की मांग की। उन्होंने गैर-भाजपा और गैर-एनडीए राजनीतिक दलों के साथ-साथ नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों और सामाजिक संगठनों से भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता के मुद्दे पर लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने का आह्वान किया। लेख के अनुसार, विभिन्न वामपंथी दलों ने इन मांगों का समर्थन किया है। साथ ही इंडिया समूह की बैठक में भी चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त रूप से आवाज उठाने की बात कही गई है।हालांकि, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े आरोपों और आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। चुनाव आयोग अथवा संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि विषय के सभी पक्ष पाठकों के सामने निष्पक्ष रूप से रखे जा सकें।






