Thursday, July 16, 2026
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प्रकृति परमात्मा की ही शक्ति है, जो आनेवाली पीढ़ी को शुद्ध प्राणवायु देगी -पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


मधुबनी,जरोद स्थित ,नीलकंठ धाम सेवाश्रम में आयोजित “परमात्मा से जुड़ने के लिए प्रकृति प्रेम आज की आवश्यकता “विषय पर अपना विचार व्यक्त करते हुए पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने कहा कि -श्री राजेश भाई जोशी जी ने नीलकंठ धाम सेवाश्रम को वास्तविक रूप से प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक बना दिया है। परिसर में जैविक और प्राकृतिक उपाय से की जा रही खेती स्वास्थ्य के लिए गुणवत्ता पूर्ण है। उन्होंने आगे कहा कि –
प्रकृति और परमात्मा से जुड़ने पर ही, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को शुद्ध प्राणवायु दे सकते हैं।जो मनुष्य दूसरों का भला करके भूल जाते हैं उनका हिसाब प्रकृति स्वयं याद रखा करती है लेकिन जो मनुष्य आदतन अपने पुण्यों का बहीखाता लिए फिरते हैं इस प्रकृति द्वारा फिर उनके पुण्य कर्मों को विस्मृत कर दिया जाता है। अपने पुण्यों के स्वयं ज्यादा बखान करने से भी पुण्यों का फल नष्ट हो जाता है। इस जीवन में जो भी पुण्य कर्म हमारे द्वारा संपन्न किये जाते हैं, सत्य समझ लेना यह प्रकृति निश्चित ही उन्हें संचित कर देती है और आवश्यकता पड़ने पर हमारी विस्मृति के बावजूद भी उनका यथा योग्य फल अवश्य ही दे दिया करती है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में प्रकृति को कभी भी मनुष्य से अलग नहीं देखा गया, बल्कि उसे एक परिवार के रूप में स्वीकार किया गया है। पिछले कुछ दशकों में रासायनिक खादों ,यूरिया और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण हमारी उपजाऊ भूमि की सेहत बुरी तरह से खराब हुई है। मिट्टी की प्राकृतिक जीवन शक्ति नष्ट हो रही है और दुषित अन्न खाकर हम तरह-तरह की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

हमें जैविक और प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा। जैविक खेती का सीधा अर्थ है प्रकृति के नियमों के अनुसार खेती करना। जब किसान इस पारंपरिक और वैज्ञानिक पद्धति को अपनाएगा, तो इससे न केवल हमारी मिट्टी का स्वाद सुधरेगा बल्कि अनाज भी शुद्ध और पौष्टिक होगा ।जब हम धरती को केवल उपभोग की वस्तु मान लेते हैं तो प्रकृति का संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ हो जाता है। आज हम दुनिया भर में जो बेमौसम बारिश ,अत्यधिक सूखा, भयानक बाढ़ और असहनीय गर्मी का प्रकोप देख रहे हैं वह कुछ और नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा संतुलन बहाल करने का एक कठोर प्रयास है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित सुंदर और जीवंत पृथ्वी मिले तो हमें अपनी आदतों और सोच को बदलना ही होगा कम से कम एक वृक्ष हर व्यक्ति को लगाने का संकल्प लेना होगा।
ज्ञातव्य है कि सेवाश्रम की तरफ से प्रतिदिन डेढ़ सौ वृद्धों,दिव्यांगो और निराश्रितों को नि:शुल्क भोजन घर पर पहुंचाया जाता है।
इसके पूर्व नीलकंठ धाम सेवाश्रम में पहुंचने पर पंडित भरत उपाध्याय गुरु जी का पारम्परिक स्वागत किया गया।

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