Sunday, June 21, 2026
No menu items!
Google search engine
Home आस पास योग-साधना में शंख ध्वनि और ठहाका का महत्वपूर्ण स्थान है-पं०भरत उपाध्याय

योग-साधना में शंख ध्वनि और ठहाका का महत्वपूर्ण स्थान है-पं०भरत उपाध्याय

0
38

विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने विभिन्न योग शिविरों में भाग लेते हुए कहा कि -शंख ध्वनि एवं ठहाका का प्राणायाम में महत्वपूर्ण स्थान है।
गूढ़ अर्थ में, ठहाका श्वांस के आरोह-अवरोह का वह सहज विस्तार है जो फेफड़ों के अंतिम छोर तक प्राणवायु पहुंचाती है।
ठहाका का उच्चतम स्वरूप ‘आत्म-विस्मृति’ है। जब मनुष्य निश्छल भाव से हंसता है, तब उसका ‘अहम्’ क्षीण हो जाता है। योग में ‘अहंकार’ का विलय ही परम लक्ष्य है। हास्य की वह एक क्षणिक अवस्था, जहाँ साधक स्वयं को भूलकर केवल आनंद में अवस्थित होता है, वह समाधि का एक लघु पूर्वाभ्यास है।योग का अंतिम ध्येय ‘आनंदमय कोश’ में प्रवेश करना है। ठहाका उस आनंद का स्थूल प्रकटीकरण है जो भीतर विद्यमान है। यह साधक को ‘समत्व’ सिखाती है सुख और दुख के द्वंद्व से ऊपर उठकर आत्मा के सहज स्वभाव ‘आनंद’ में स्थित हो जाना।
योग-साधना में ठहाका बाह्य कर्म ही नहीं, वह भीतर छिपे ‘आनंद-ब्रह्म’ का स्फुरण है। एक योगी के लिए ठहाका वह प्रकाश पुंज है जो मार्ग की जटिलताओं को सरल बना देती है। ठहाका का यह गूढ़ अन्वेषण हमें स्मरण कराता है कि सत्य अत्यंत गंभीर नहीं, अत्यंत हलके और आनंदित होकर ही उपलब्ध होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

error: Content is protected !!