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हरी खाद से बचेगी धरती माता, रासायनिक उर्वरक पर घटेगी निर्भरता आयेगी खेती में खुशहाली

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अनिल कुमार शर्मा मझौलिया पश्चिम चंपारण, बिहार

बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है। ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर पश्चिम चम्पारण के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ अभिषेक प्रताप सिंह ने किसानों भाइयों से अपील की है कि वे ढैंचा की फसल को हरी खाद के रूप में खेतों में मिलाएं और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग धीरे-धीरे कम करें। ढैंचा एक दलहनी फसल है जिसकी जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया पाए जाते हैं। इसे 45-50 दिन की अवस्था में खेत में जोतकर मिट्टी में मिला देने से प्रति एकड़ लगभग 25-30 किलो नाइट्रोजन की पूर्ति हो जाती है। इससे यूरिया की 50-60 किलो तक बचत होती है। साथ ही मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है, जल धारण क्षमता सुधरती है और कठोर हो चुकी भूमि भुरभुरी बनती है।डॉ सौरभ दुबे वैज्ञानिक पौधा संरक्षण ने बताया कि खेत बचाओं अभियान में प्रति दिन किसानों को सुझाव दिया जाता है कि ढैंचा की खेती पर प्रति एकड़ खर्च मात्र 800-1000 रुपये आता है, जबकि इसके लाभ से रासायनिक खाद पर होने वाला 2000-2500 रुपये का खर्च बच जाता है। लगातार प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति प्राकृतिक रूप से सुधरती है और फसल उत्पादन की लागत घटती है साथ ही साथ खरपतवार के समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है। खेत बचाओ अभियान’ के तहत सभी वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक भी कर रहे हैं। डॉ सिंह ने कहा कि”धरती माता को बचाने के लिए जैविक खेती ही एकमात्र विकल्प है।

ढैंचा जैसी हरी खाद फसलों को खेत में पलटकर हम जमीन को जहरीले रसायनों से बचा सकते हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए उपजाऊ जमीन छोड़ सकते हैं।”
कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर द्वारा 18 जून को प्राकृतिक खेती पर बड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 200 से अधिक किसानों के शामिल होने की संभावना है। कार्यक्रम के दौरान ढैंचा की खेती, उसे खेत में मिलाने की सही विधि और समय की जानकारी दी जाएगी। केंद्र पर ढैंचा को बीज उत्पादन वाले खेतों में हरी खाद के रूप में पलटा भी जा रहा है, ताकि किसान प्रत्यक्ष देखकर सीख सकें।
डॉ सिंह ने बताया, “यह कदम ‘खेत बचाओ अभियान’ को मजबूती देगा और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देगा। अगर जिले के 50% किसान भी हरी खाद अपनाते हैं, तो सालाना हजारों टन रासायनिक उर्वरक की खपत कम होगी और मिट्टी की सेहत में सुधार होगा।”
किसानों से अनुरोध है कि खाली खेतों में ढैंचा की बुआई करें और 45 दिन बाद फूल आने से पहले उसे खेत में जोत दें। यही धरती माता की सच्ची सेवा होगी। केंद्र के कर्मियों में कमलेश कुमार, शंभू कुमार, मनोज कुमार, शैलेन्द्र कुमार, मुन्ना कुमार के अलावे दर्जनों किसान भाई उपस्थित थे।

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