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मोहब्बत और भाई चारा का पैगाम लेकर आता है ईद-उल-अजहा -पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने अपने सभी मुस्लिम मित्रों को ईद-उल-अज़हा (बकरीद) की हार्दिक शुभकामनाएं एवं दिल से मुबारकबाद देते हुए कहा कि- अल्लाह आपकी हर दुआ कबूल करें,ज़िंदगी में खुशियाँ, बरकत और सुकून भर दें।
कुर्बानी का यह पाक त्योहार
आपके घर में मोहब्बत और भाईचारा लेकर आए।उन्होंने कहा कि जहां तक मेरे जानकारी में बकरीद (ईद-उल-अज़हा) पैगंबर हज़रत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के प्रति दिखाए गए अटूट प्रेम, त्याग और समर्पण की याद में मनाई जाती है।इस दिन मुसलमान भाई सुबह की विशेष नमाज अदा करते हैं और अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी (बलि) देते हैं।इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार अल्लाह ने पैगंबर हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की निष्ठा और प्रेम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज़ का बलिदान देने को कहा, हज़रत इब्राहिम को बहुत बुढ़ापे में पुत्र रत्न (हज़रत इस्माइल) की प्राप्ति हुई थी, इसलिए उन्हें अपना बेटा जान से भी ज़्यादा प्यारा था।

जब इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल को अल्लाह के हुक्म पर कुर्बान करने के लिए आगे बढ़े और उनकी गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह उनके इस त्याग और विश्वास से बेहद प्रसन्न हुए।अल्लाह के आदेश से चमत्कारिक रूप से हज़रत इस्माइल की जगह एक दुम्बा (भेड़ जैसा जानवर) आ गया और इस्माइल सुरक्षित बच गए।अल्लाह को हज़रत इब्राहिम की नीयत इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस घटना को हमेशा के लिए इबादत (कुर्बानी) के तौर पर मुकर्रर कर दिया ।यह घटना हज़रत इब्राहिम के समय की है तब से लेकर आज तक, दुनिया भर के मुसलमान ज़िलहिज्जा (इस्लामिक कैलेंडर का आखिरी महीना) के 10 वें दिन इस त्योहार को मनाते हैं।कुर्बानी यह सिखाता है कि इंसान को अल्लाह के हुक्म के आगे अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी न्योछावर करने के लिए तैयार रहना चाहिए।इस दिन दी जाने वाली कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है—एक हिस्सा गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों/दोस्तों के लिए और तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए होता है।

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