विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज मधुबनी के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने देवरिया स्थित बारीपुर धाम में चल रहे साप्ताहिक शिवमहापुराण कथा में सम्मिलित हो कर कथारस पान किया ।आज के सार्थक कथा को सार्वजनिक करते हुए उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कथाकार रघुनंदन महाराज जी ने एक दृष्टांत के द्वारा श्रोताओं को बताया कि आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता हर आत्मा में परमेश्वर का वाश होता है। धर्मराज के यहां मात्र हमारे मंत्र ही नहीं गिने जाते, अपितु हमारी भावना का भी मूल्यांकन होता है –
“कर्मणो गहना गति:” यानी कर्मों की गति गहन है।
दो विशालकाय यमदूत खड़े थे। भैंसे का सिर, लाल आंखें। राघवेंद्र डरे नहीं। बोले, “यहां क्या कर रहा हूं? मुझे विष्णुदूत लेने आने वाले थे।”
यमदूत हंसा। उसकी हंसी से जमीन कांपी। “विष्णुदूत? शास्त्री! पहले चित्रगुप्त की सभा में तो हाजिर हो। वहां पता चलेगा कि विमान आएगा या तेल का कड़ाहा।”
राघवेंद्र को गुस्सा आया। “मैंने जीवन भर पाप नहीं किया। मांस नहीं छुआ, मिथ्या भाषण नहीं किया, पराई स्त्री को अनुचित भावना से नहीं देखा। रोज 6 घंटे पूजा की।”
दूसरा यमदूत बोला, “तभी तो तुम्हारा प्रकरण विशिष्ट है। चलो।” चित्रगुप्त की सभा- सभा बहुत बड़ी थी। लाखों आत्माएं पंक्ति में थीं। कोई रो रहा था, कोई गिड़गिड़ा रहा था। बीच में धवल पत्थर की चौकी पर चित्रगुप्त बैठे थे। उनके सामने एक मोटी पोथी खुली थी। हर पन्ना अपने आप पलट रहा था।
राघवेंद्र का नाम पुकारा गया। वह आगे बढ़े। प्रणाम किया।

चित्रगुप्त ने बिना देखे कहा, “राघवेंद्र शास्त्री, काशी। जन्म 1948। मृत्यु 2026। कर्म देखे जाएं।” पोथी के पन्ने तेजी से पलटने लगे। एक तरफ सोने के अक्षर थे: गंगा स्नान – 18,250 दिन। जाप – 2,19,00,000 बार। कथा – 4,380 बार। अन्नदान – 12,000 लोगों को।
राघवेंद्र का सीना चौड़ा हो गया। उन्होंने यमदूतों की तरफ देखा।
पर तभी पोथी का रंग बदला। दूसरे हिस्से में काले अक्षर उभरने लगे।
चित्रगुप्त की भौंहें तन गईं।
“अब दूसरे पक्ष को देखो शास्त्री।” पहला भयावह सच: अहंकार की भूख पहला काला पन्ना खुला। दृश्य उभरा। 40 साल पहले का समय। एक गरीब विधवा अपने बेटे की बीमारी के लिए शास्त्री जी के पास आई थी।
“गुरुजी! पूजा कर दीजिए। बच्चा बच जाए। मेरे पास 10 रुपए ही हैं।” राघवेंद्र ने कहा था, “10 में तो संकल्प भी नहीं होता। 1100 लगेंगे।”
विधवा रोती हुई चली गई। 3 दिन बाद बच्चा मर गया।
राघवेंद्र चिल्लाए, “ये क्या दिखा रहे हो? मैं पुरोहित हूं। दक्षिणा तो शास्त्र में लिखी है।”
चित्रगुप्त बोले, “शास्त्र में दक्षिणा श्रद्धा से है, कीमत से नहीं। तुमने उस दिन भगवान को दुकान बना दिया। तुम्हारी जाप की माला का एक मनका टूट गया।” राघवेंद्र के सामने उनकी 50 साल की माला दिखी। उसमें से एक मनका गायब था। दूसरा सच: मौन का पाप दूसरा पन्ना। 25 साल पुराना दृश्य। राघवेंद्र के सबसे बड़े शिष्य मोहन ने गुरुकुल की 3 बच्चियों के साथ दुराचार किया। एक बच्ची ने रोते हुए राघवेंद्र को बताया। राघवेंद्र ने सबके सामने मोहन को डांटा नहीं। एकांत में बुलाकर कहा, “आश्रम की बदनामी होगी। तू 6 महीने के लिए कहीं चला जा। बाद में सब भूल जाएंगे। मेरा नाम मत डुबोना।” मोहन चला गया। पर उन बच्चियों का जीवन नष्ट हो गया। एक ने 20 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली। राघवेंद्र गिर पड़े। “मैंने… मैंने गुरुकुल की लाज रखी थी।”
“नहीं,” चित्रगुप्त गरजे। “तुमने अपनी लाज रखी। तुमने धर्म को चुप्पी की चादर ओढ़ा दी। इसे ‘मौन का पाप’ कहते हैं। जानकर अन्याय देखना, और रोकने की शक्ति होते हुए भी चुप रहना, कर्ता से बड़ा पाप है।” उनकी जाप की माला से 108 मनके एक साथ टूटकर बिखर गए। तीसरा सच: ईर्ष्या का धुआं तीसरा पन्ना। काशी के दूसरे विद्वान पंडित हरिप्रसाद। बहुत सरल, बहुत ज्ञानी। लोग उनकी कथा में ज्यादा जाने लगे। राघवेंद्र ने अपने शिष्यों से कहलवाया कि “हरिप्रसाद का उच्चारण शुद्ध नहीं है। उसका फल नहीं मिलता।” धीरे धीरे हरिप्रसाद की सभा उठ गई। वह अपमान से काशी छोड़कर चला गया।

“मैंने तो सिर्फ सत्य कहा था,” राघवेंद्र फुसफुसाए।
“नहीं! तुम्हारा उच्चारण भी कई बार गलत हुआ। पर तुम्हारा अहंकार ये नहीं देख पाया कि कोई तुमसे अच्छा बोल सकता है। तुमने सरस्वती के पुत्र का अपमान किया। यह ब्रह्महत्या के समान है।” इस बार पूरी माला ही काली पड़ गई।
यमराज का न्याय
तभी सिंहासन पर यमराज प्रकट हुए। काले बादल जैसे वस्त्र, हाथ में दंड। “राघवेंद्र! तूने 18,250 दिन गंगा में डुबकी लगाई, पर एक दिन भी अपने अहंकार को नहीं डुबोया। तूने करोड़ बार राम नाम लिया, पर एक बार भी राम को अपने अंदर नहीं उतारा।
तेरी भक्ति पेट के लिए थी, पद के लिए थी, प्रतिष्ठा के लिए थी। प्रेम के लिए नहीं।”
राघवेंद्र रोने लगे। “तो क्या मेरी सारी पूजा व्यर्थ गई महाराज?”
यमराज ने दंड जमीन पर मारा। एक तराजू प्रकट हुआ। एक पलड़े में राघवेंद्र के सारे जाप, दान, कथा रखे गए। दूसरा पलड़ा खाली था।
फिर चित्रगुप्त ने तीन काले मनके उठाए: अहंकार, मौन, ईर्ष्या। उन्हें दूसरे पलड़े में रखा।
सोने वाला पलड़ा ऊपर उठ गया। काले मनकों वाला पलड़ा भारी पड़कर नीचे टिक गया।
सभा में सन्नाटा।
यमराज बोले, “भक्ति का वजन कर्म से नहीं, भाव से होता है शास्त्री। तूने भगवान को पाने के लिए नहीं, भगवान को भुनाने के लिए भजा। यही तेरा सबसे भयावह सच है। तू भक्त नहीं, व्यापारी था।”
दंड या प्रायश्चित
यमदूत आगे बढ़े। “तेल के कड़ाहे में 100 साल।”
राघवेंद्र घुटनों पर गिर गए। तभी पीछे से आवाज आई।
“रुको !” एक बूढ़ी आत्मा लाइन तोड़कर आगे आई। वही विधवा। जिसका बेटा मरा था।
वह चित्रगुप्त से बोली, “महाराज, इसने मेरा बेटा तो नहीं बचाया, पर इसके बताए मंत्र से मैंने बाद में 5 और बच्चों की जान बचाई। मैं इसका आधा दंड अपने ऊपर लेती हूं।”
फिर एक और आत्मा आई। उस बच्ची की जिसने आत्महत्या की थी। बोली, “गुरुजी ने मुझे न्याय नहीं दिया, पर इनकी कथा सुनकर ही मैंने मरने से पहले 2 साल तक जीने की कोशिश की थी। मैं भी इनके पाप का हिस्सा लेती हूं।” तीसरे आए पंडित हरिप्रसाद। “इसने मेरा अपमान किया, पर इसी के डर से मैंने शुद्ध उच्चारण का इतना अभ्यास किया कि मरते समय मेरे मुंह से नारायण निकला। मैं मुक्त हुआ। इसका दंड मैं कम करवाता हूं।” यमराज मुस्कुराए। “देखो शास्त्री! जिन्हें तुमने दुख दिया, वही तुम्हें बचा रहे हैं। इसे कहते हैं कर्म का चक्र।”
नया जन्म, नया मौका
यमराज ने दंड बदला। “100 साल कड़ाहा नहीं। 1 जन्म मिलेगा। पर याद कुछ नहीं रहेगा। तू एक चांडाल के घर पैदा होगा। बचपन से भेदभाव सहेगा। अगर उस जन्म में तू बिना मंत्र के, बिना माला के, सिर्फ सेवा से किसी एक की भी पीड़ा हर पाया, तो तेरे सारे काले मनके धुल जाएंगे।”
राघवेंद्र ने हाथ जोड़े। “पर महाराज, अगर मैं फिर भटक गया?” तो यमलोक हमेशा खुला है। पर याद रखना, भगवान नाम से नहीं, नीयत से रीझते हैं।”एक झटका लगा। राघवेंद्र की आत्मा नीचे गिरने लगी। आखिरी बार उसने ऊपर देखा। चित्रगुप्त की पोथी बंद हो रही थी। उस पर सोने से लिखा था: “अंत भला सो भला।”
काशी में एक नया जन्म
उसी रात काशी की एक मेहतर बस्ती में एक बच्चा रोया। बहुत काला, बहुत कमजोर। उसका नाम रखा गया भीमा।
भीमा को पढ़ना नहीं आया। मंत्र नहीं आया। पर उसे दर्द पहचानना आ गया। वह रोज घाट पर जाता। जो लाशें लावारिस होतीं, उन्हें कंधा देता। जो बीमार होते, उन्हें पानी पिलाता। 30 साल की उम्र में हैजा फैला। सब भाग गए। भीमा अकेला रुका। उसने 11 लोगों की सेवा की। 3 बच गए, 8 मर गए। मरते समय एक बूढ़ा बोला, “बेटा, तू कौन है?” भीमा हंसा, “मैं कोई नहीं बाबा। बस एक इंसान।” रात में भीमा को बुखार आया। मरते समय उसके चेहरे पर वही तेज , जो राघवेंद्र के चेहरे पर था। पर इस बार कोई शिष्य नहीं था। सिर्फ 3 लोग थे जिन्हें उसने बचाया था। वे रो रहे थे। ऊपर यमलोक में चित्रगुप्त ने पोथी खोली। काले मनके गायब थे। उनकी जगह 3 सुनहरे आंसू चमक रहे थे। यमराज ने दंड तोड़ा। बोले, “विमान तैयार करो। आज एक व्यापारी नहीं, एक भक्त आ रहा है।” और इस बार राघवेंद्र नहीं, भीमा ने आंखें खोलीं। सामने विष्णुदूत खड़े थे। हाथ में कमल।पीछे यमलोक का दरवाजा बंद हो रहा था। उस पर अब भी लिखा था: “कर्मणो गहना गति:” पर भीमा पढ़ नहीं पाया। उसे जरूरत भी नहीं थी क्योंकि उसने कर्म को पढ़ा नहीं, जीया था।माला जपने से हरि नहीं मिलते, जब तक मन का अहंकार न मिटे। दान देने से स्वर्ग नहीं मिलता, जब तक दान में दया न हो। कथा कहने से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक कथा स्वयं न बन जाओ।
इस कथा के श्रवण से सभी श्रोताओं की आंखें भीगीं हुईं थी।






