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श्रीराम द्वारा लंका विजय ही विजयदशमी है -पं-भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


श्रीराम के राक्षसराज रावण से युद्ध में विजय प्राप्त करने में भगवान शिव और शक्ति का अपूर्व सहयोग है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी।नौ दिनों तक माँ दुर्गा की आराधना करने के बाद भगवान श्रीराम ने दशहरे के दिन ही लंकापति रावण का वध किया था।मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था।
रावण को दशानन कहा गया है। उसके 10 मुख दुर्गुणों के ही प्रतीक हैं। आज की परिस्थिति में दुर्गुण-रूपी राक्षस दृष्टिगोचर होते हैं, हमारा संकल्प होना चाहिए कि इस विजयादशमी पर उनके विनाश के लिए हम अपने भीतर रामत्व का आह्वान करें। इस प्रकार दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
श्रीराम ने रावण के अहंकार को चूर-चूर करके दुनिया के लिए भी एक बहुत मूल्यवान शिक्षा प्रदान की, जिसकी हम सभी को रोजमर्रा के जीवन में बहुत जरूरी है। श्रीराम की यही सीख मानवीय जीवन में बहुउपयोगी सिद्ध होगी। हमें भी अपने जीवन काल में अहंकार, लोभ, लालच और अत्याचारी वृत्तियों को त्याग कर क्षमावान बनकर जीवन जीना चाहिए। भगवान राम की यह सीख बहुत ही सच्ची और हमें मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाने वाली है ।इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीलाका आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है।

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