अनिल कुमार शर्मा मझौलिया पश्चिम चंपारण, बिहार
केले की खेती देश के लाखों किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्कैरिंग बीटल नामक कीट किसानों के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। यह छोटा सा कीट केले के फलों की बाहरी सतह को खुरचकर उन्हें दागदार बना देता है, जिससे उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है और बाजार में कीमत कम मिलती है। कई बार फलों पर पड़े दाग इतने अधिक होते हैं कि व्यापारी उन्हें खरीदने से भी कतराने लगते हैं। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई पॉलीप्रोपाइलीन बैगिंग तकनीक किसानों के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है।
कृषि अनुसंधानों और किसानों के खेतों पर किए गए प्रदर्शन परीक्षणों से यह स्पष्ट हुआ है कि केले के गुच्छों को नॉन-वोवन पॉलीप्रोपाइलीन बैग से ढकने पर स्कैरिंग बीटल का प्रकोप लगभग समाप्त हो जाता है। साथ ही फलों की गुणवत्ता, आकार, रंग और चमक में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलता है।
कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर वरीय वैज्ञानिक एव प्रधान डॉक्टर अभिषेक प्रताप सिंह के अनुसार स्कैरिंग बीटल वयस्क कीट फल की ऊपरी त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे फल पर भूरे और काले रंग के निशान पड़ जाते हैं। देखने में खराब लगने वाले ऐसे फलों को बाजार में कम कीमत मिलती है। बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में यह कीट किसानों को हर वर्ष भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाता है। अनुमान है कि इसके कारण कई क्षेत्रों में 20 से 40 प्रतिशत तक आर्थिक क्षति होती है।

केंद्र के पौधा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सौरभ दूबे बताते हैं कि केले के गुच्छों पर फूलों की बाहरी पंखुड़ियां गिरने के बाद जब फल विकसित होना शुरू होते हैं, उसी समय पूरे गुच्छे को विशेष प्रकार के पॉलीप्रोपाइलीन बैग से ढक दिया जाता है। यह बैग फलों के चारों ओर सुरक्षा कवच का काम करता है और कीटों को सीधे फलों तक पहुंचने से रोकता है। इसके अलावा धूल, मिट्टी, मकड़ी के जालों, पक्षियों और अन्य बाहरी कारणों से होने वाले नुकसान से भी फल सुरक्षित रहते हैं। बैग के अंदर बनने वाला सूक्ष्म वातावरण फलों के विकास के लिए अनुकूल माना जाता है, जिससे उनका आकार और वजन बेहतर होता है तथा फल अधिक आकर्षक दिखाई देते हैं।
पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में किसानों के खेतों पर किए गए एक अध्ययन में इस तकनीक के बेहद उत्साहजनक परिणाम सामने आए। अध्ययन के दौरान बिना ढके केले के गुच्छों में स्कैरिंग बीटल का प्रकोप 98.5 प्रतिशत तक दर्ज किया गया, जबकि पॉलीप्रोपाइलीन बैग से ढके गुच्छों में यह घटकर केवल 1.8 प्रतिशत रह गया।
इसके साथ ही फलों के वजन में 7.5 प्रतिशत तथा गुच्छे के कुल वजन में 4.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इतना ही नहीं, फसल की कटाई भी लगभग आठ दिन पहले संभव हुई, जिससे किसानों को समय पर बाजार में फल बेचने का लाभ मिला। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि बैगिंग तकनीक अपनाने से धूल, मकड़ी के जालों और पक्षियों द्वारा होने वाली क्षति में भी उल्लेखनीय कमी आई।
बिहार के किशनगंज जिले में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा वर्ष 2021-22 में किसानों के खेतों पर किए गए प्रदर्शन परीक्षण में भी इसी प्रकार के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए। अध्ययन में पाया गया कि पॉलीप्रोपाइलीन बैग का उपयोग करने पर स्कैरिंग बीटल का प्रकोप घटकर मात्र 1.5 प्रतिशत रह गया। इसके साथ ही उत्पादन बढ़कर 455 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया। फलों के औसत वजन में 9.9 प्रतिशत, गुच्छों के वजन में 11 प्रतिशत तथा कुल उत्पादन में 10.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन के कारण किसानों की सकल आय 8.64 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंची, जबकि शुद्ध लाभ 5.84 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया। लाभ-लागत अनुपात 2.08 पाया गया, जो इस तकनीक की आर्थिक उपयोगिता को प्रमाणित करता है।
कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर के वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान समय में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, तब पॉलीप्रोपाइलीन बैगिंग तकनीक किसानों को एक सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल विकल्प प्रदान करती है। इस तकनीक को अपनाने से कीटनाशकों के उपयोग में कमी आती है, जिससे उत्पादन लागत घटती है और अवशेष मुक्त गुणवत्तापूर्ण फल प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि इसे पर्यावरण हितैषी कृषि तकनीक के रूप में भी देखा जा रहा है। निर्यात बाजार में भी ऐसे साफ-सुथरे और दाग-धब्बों से मुक्त फलों की मांग अधिक रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत विश्व के सबसे बड़े केला उत्पादक देशों में शामिल है और भविष्य में गुणवत्ता आधारित उत्पादन ही किसानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को तय करेगा। ऐसे में गुच्छा आवरण या बैगिंग तकनीक किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। कम लागत, आसान उपयोग और बेहतर परिणामों के कारण यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि गुच्छा निकलने के तुरंत बाद उपयुक्त आकार के नॉन-वोवन पॉलीप्रोपाइलीन बैग का उपयोग किया जाए ताकि फलों को विकास की पूरी अवधि के दौरान सुरक्षा मिल सके।
कृषि क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बीच पॉलीप्रोपाइलीन बैगिंग तकनीक केले की खेती में एक नई आशा बनकर उभरी है। यह केवल एक कीट प्रबंधन तकनीक नहीं, बल्कि उत्पादन, गुणवत्ता और किसानों की आय तीनों को एक साथ बढ़ाने वाला प्रभावी कृषि नवाचार है। बिहार और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में प्राप्त परिणाम इस बात का संकेत हैं कि यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो आने वाले वर्षों में केला उत्पादन अधिक लाभकारी, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बन सकता है






