विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
मधुबनी, पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने श्राद्ध पक्ष के माहात्म्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि -पितृ तर्पण, मनुष्य तर्पण, देव तर्पण, भीष्म तर्पण, मनुष्यपितृ तर्पण,यम तर्पण की विधि से प्रभावित होकर पाश्चात्य देशों के लोग भी आज गया में पितृपक्ष में पितरों को पिंडदान कर रहे हैं।
गया की धरती इसलिए भी विशेष मानी जाती है ,क्योंकि यहां एक ओर भगवान विष्णु के चरणों से जुड़ी धार्मिक परंपरा है, तो दूसरी ओर माता सीता और फल्गु नदी की कथा ।एक ओर गयासुर की भक्ति है ,तो दूसरी ओर पितरों के प्रति श्रद्धा की परंपरा। यही कारण है कि गया केवल एक शहर नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। कहते हैं समय बदलता है ,राज बदलते हैं, पीढियां बदल जाती हैं ,लेकिन कुछ कथाएं लोगों की स्मृतियों में बनी रहती हैं ।

गयासुर की कथा भी ऐसी ही है एक असुर जिसने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया, एक वरदान जिसने सृष्टि का संतुलन हिला दिया, एक धर्मशिला जिस पर भगवान के चरण पड़े और एक नदी जिसके बारे में आज भी लोग कहते हैं ,उसका पानी धरती के नीचे छुपा है । अगर इस कथा को एक वाक्य में समझना हो तो शायद यही कहा जा सकता है कि भक्ति मनुष्य को महान बनाती है, लेकिन शक्ति के साथ जिम्मेदारी होना भी उतना ही आवश्यक है ।गयासुर ने अपनी शक्ति को दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित किया और इसी कारण उसकी कथा आज भी श्रद्धा से याद की जाती है। गया की पवित्र भूमि भगवान विष्णु के चरण, गयासुर की भक्ति और माता सीता से जुड़ी फल्गु नदी की है ।

यह कथा हमें यही संदेश देती है की आस्था केवल चमत्कार खोजने का नाम नहीं है, आस्था अपने पूर्वजों का सम्मान करने सत्य का साथ देने का नाम है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों के लोग आज गया में पितरों को पिंडदान करके उनकी आत्मा को शांति प्रदान कर रहे हैं।






