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खाली जेब ने बदल दिए रिश्तों के मायने.. नरेंद्र पांडेय

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मुश्किल वक्त में सामने आई अपनों की असली पहचान.

विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार

आधुनिक जीवन की भागदौड़ और बढ़ती भौतिकवादी सोच के बीच रिश्तों की परिभाषा भी बदलती नजर आ रही है। इस पर बगहा 1 प्रखंड के बेलवा डुमरिया निवासी पत्रकार समाजसेवी देश भक्त नरेंद्र पांडेय ने कुछ इस तरह से असल जिंदगी में होने वाले समय के बदलाव के साथ असल जिंदगी की सफर पर आधारित लेख पर कहा..समाज में अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है कि जब तक व्यक्ति के पास धन और संसाधन होते हैं, तब तक उसके आसपास मित्रों और शुभचिंतकों की कमी नहीं रहती। लेकिन जैसे ही आर्थिक संकट आता है, कई रिश्तों की वास्तविकता सामने आने लगती है। कहा जाता है कि “खाली जेब इंसान को नहीं, बल्कि उसके आसपास के लोगों को पहचानने का अवसर देती है।” सुख और समृद्धि के समय साथ रहने वाले अनेक लोग कठिन परिस्थितियों में दूरी बना लेते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को यह समझ में आता है कि कौन उसका सच्चा हितैषी है और कौन केवल स्वार्थ के कारण जुड़ा हुआ था। कुछ सामाजिक चिंतकों का मानना है कि धन जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है, लेकिन किसी रिश्ते की वास्तविक मजबूती प्रेम, विश्वास और सम्मान पर आधारित होती है। जिन संबंधों की नींव केवल आर्थिक लाभ पर टिकी होती है, वे परिस्थितियां बदलते ही कमजोर पड़ जाते हैं। आज के कलियुग में यह धारणा तेजी से फैल रही है कि कुछ लोग मित्रता और संबंधों को भी आर्थिक स्थिति के आधार पर आंकने लगे हैं। हालांकि इसके विपरीत ऐसे लोग भी समाज में मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में अपने मित्रों और परिजनों का साथ निभाते हैं और यही रिश्तों की असली पहचान मानी जाती है।
जीवन का अनुभव बताता है कि संकट की घड़ी में साथ खड़े रहने वाले लोग ही सच्चे मित्र और अपने कहलाते हैं। धन का महत्व अपनी जगह है, लेकिन मानवता, संवेदना और निष्ठा ही किसी भी रिश्ते को लंबे समय तक जीवित रखती है।

“खाली जेब ने बदल दिए रिश्ते, मुश्किल वक्त में सामने आई अपनों की असली पहचान” अब देखना है कि डिजिटल इंडिया में डिजिटल जिंदगी का कितना बोझ पड़ता है। दुनिया में ऐसे 95 फीसदी जीवित लोग हैं जो पैसे की अहमियत पर मृत प्राय जैसे जीवित रहकर दुनिया के चकाचौंध में अपनी जरूरतों की तलाश में परेशान रहते हैं। पुरानी परंपराओं में लोग सामाजिकता के आधार पर अपनी जीवंत समाज के बेहतर कार्य शैली को चुनकर अपनी प्रतिभावों को समाज के सामने परोसते थे। आज भी संत समाज के लोग कहते हैं. पैसे के लिए लोग अपने माता पिता को भूल जाते हैं जिन्होंने उन्हें जन्म देकर जवाँ तक परवरिश किया था। कहते हैं कि जन्म लेते ही धन संसाधन लेकर नहीं आते हैं। जब अंतिम सांस चली जाती है तो खाली हाथ ही दो गज की कपड़े साथ लेकर जाना होता है। आखिर इस दुनिया के लोगों में इतना वैमनस्व और घृणा की तस्वीरें सामने क्यों आ जाती है। अब भी मौका है आदमी को अपने हाथों में सब कुछ करने का जज्बा है। परंतु बुरे कार्य को छोड़ अच्छे कार्यों में अपना समय व्यतीत करे तो आने वाले कल समाजवाद के लिए जीवंत उदाहरण हो सकता है। नई पीढ़ी के युवाओं के लिए एक खास संदेश है कि डिजिटल की दूधिया रौशनी से दूर रह कर पुरानी परंपराओं की पहचान दिलाये और बेहतर भविष्य की नींव की स्थापना करें। साथ ही इन युवा पीढ़ियों से निवेदन है कि मोबाइल से दूरी बनाकर रहें क्योंकि शिक्षा का बड़ा महत्व है। यदि आप अभी 8 घंटे किताब के पन्नों में दिलचस्प रख पढ़ाई करते हैं तो कहीं न कहीं आपकी जिंदगी बेहतर साबित हो सकती है। यदि नहीं तो आपको 16 घंटे मजदूरी करने पड़ेंगे और उस समय आपको पैसे का महत्व का पता चलेगा तब तक आपकी उम्र चौखट ढलान की तरफ जा रही होगी।

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