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कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर में छात्रों को सिखाए बोनसाई निर्माण के गुर

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व्यावहारिक प्रशिक्षण के दौरान छात्रों ने सीखी पौधों की छंटाई, रोपण और आकार देने की तकनीक

अनिल कुमार शर्मा मझौलिया पश्चिम चंपारण, बिहार

माधोपुर। कृषि विज्ञान केंद्र माधोपुर में पंडित दीन दयाल उपाध्याय बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय, पिपराकोठी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के छात्रों के लिए संचालित रूरल हॉर्टिकल्चरल वर्क एक्सपीरियंस (RHWE) कार्यक्रम के तहत बोनसाई निर्माण एवं रख-रखाव पर प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इस दौरान छात्रों को बोनसाई तैयार करने की तकनीक के साथ इसके व्यावसायिक महत्व की भी जानकारी दी गई। केंद्र के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने बताया कि बोनसाई बनाने की कला काफी पुरानी है और जापान में इसे विशेष पहचान मिली। वर्तमान समय में प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षक स्वरूप के कारण बोनसाई की मांग बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि बोनसाई तैयार करना शौक के साथ-साथ स्वरोजगार और आय का अच्छा साधन भी बन सकता है। कम समय में पौधों को आकर्षक आकार देकर इन्हें तैयार किया जा सकता है और बाजार में अच्छे मूल्य पर बेचा जा सकता है।

उन्होंने छात्रों को बताया कि आकार के आधार पर बोनसाई को विभिन्न श्रेणियों में रखा जाता है। लगभग 15 सेंटीमीटर तक के बोनसाई को सबसे छोटा, 15 से 30 सेंटीमीटर तक को छोटा, 30 से 60 सेंटीमीटर तक को मध्यम तथा 60 सेंटीमीटर से अधिक ऊंचाई वाले बोनसाई को बड़ा माना जाता है। पौधा रोग विशेषज्ञ डॉ. सौरभ दुबे ने बोनसाई के रख-रखाव और देखभाल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बोनसाई बड़े पेड़ या पौधे का छोटा और आकर्षक रूप होता है, जिसे उचित तकनीक के माध्यम से प्राकृतिक स्वरूप प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को उचित आकार एवं जल निकास वाले पात्र का चयन, जड़ों की छंटाई, पौधे का रोपण, मिट्टी को जड़ों के आसपास अच्छी तरह दबाने तथा पौधे को इच्छित आकार देने की व्यावहारिक जानकारी दी गई। छात्रों ने शाखाओं को व्यवस्थित करने के लिए तांबे के तार के उपयोग का भी अभ्यास किया।वैज्ञानिकों ने बताया कि बोनसाई को पर्याप्त धूप और खुला वातावरण मिलना जरूरी है। नियमित सिंचाई करते समय इतना पानी देना चाहिए कि वह पात्र के नीचे से बाहर निकलने लगे। वहीं, शाखाओं पर तार बांधते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि तार अधिक कसने से तने और शाखाओं पर निशान न पड़े। प्रशिक्षण के माध्यम से छात्रों ने बोनसाई निर्माण की व्यावहारिक तकनीक सीखने के साथ इसके रोजगारपरक एवं व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को भी समझा।

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