विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
हिंदी दिवस के अवसर पर प्रतिष्ठित विद्वानों के द्वारा आयोजित गोष्टी को संबोधित करते हुए पूर्व प्राचार्य पंडित भरत उपाध्याय ने कहा कि- दुनिया में आज जहां हमारी हिंदी है, वहां उसके खड़े होने की जमीन तैयार करने में इन गोष्ठियों का बहुत महत्व है।
गुंजी हिंदी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार। राष्ट्र संघ के मंच से, हिंदी का जयकार।
विश्व विख्यात हो रही मातृभाषा,भारतीय वाङ्मय, सांस्कृतिक समरसता तथा दार्शनिक चेतना की अखंड संवाहिका के रूप में हिंदी प्रतिष्ठित है। प्रतिवर्ष १४ सितंबर का यह पावन प्रसंग इस समृद्ध भाषा के ऐतिहासिक अवदान, भाषिक सामर्थ्य तथा उसकी असीम संभावनाओं के गंभीर अनुशीलन का उद्घोष करता है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वाधीनता और स्वावलंबन के परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित किया था । “राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।”
साहित्यिक पुनर्जागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मौलिक अस्मिता के शाश्वत सिद्धांत को उद्घाटित करते हुए उद्घोष किया ।

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”
महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी जनजागरण, वैदिक चिंतन और वैचारिक क्रांति के प्रसार हेतु इसी भाषा को माध्यम स्वीकार किया। संविधान सभा द्वारा १४ सितंबर 1949 को इसे संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया। प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट निर्देश दिया था –
“जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव की अनुभूति नहीं है, वह कदापि समुन्नत नहीं हो सकता।”
वर्तमान कालखंड में हिंदी ज्ञान-मीमांसा, वैज्ञानिक विमर्श, उच्च शोध तथा वैश्विक क्षितिज पर अपनी उपादेयता सिद्ध कर रही है। भाषा का वास्तविक अभ्युदय तभी संभव है जब इसे विधि, प्रशासन और उच्चतर शिक्षा का प्राथमिक माध्यम बनाया जाए। इस अवसर शैलेंद्र दत्त शुक्ला, जितेंद्र मणि त्रिपाठी, डॉक्टर देवेंद्र मणि त्रिपाठी, डॉक्टर अजय पांडेय ,पंडित महेश्वर उपाध्याय ने भी अपना विचार प्रस्तुत किया।






