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मानवजनित आपदा को नियंत्रित करने केलिए सामुहिक प्रयास करना होगा -पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


प्रख्यात पर्यावरणविद् एवं प्रकृति प्रेमी पूर्व प्राचार्य पंडित भरत उपाध्याय ने लोगों को सावधान करते हुए कहा कि, नेपाल के पहाड़ों से निकलने वाली गंडकी(नारायणी) नदी उत्तरी बिहार के कई जिलों के लिए जीवन रेखा मानी जाती है। वर्षा के दिनों में यह नदी विकराल रूप धारण कर गांवों और खेतों में तबाही मचाती है। यह नदी उद्गम से संगम तक कई धाराओं में बहती है। जंगल और नदी के पेट में रहते हुए भी, हम लोग वर्तमान में भीषण गर्मी के चपेट में हैं। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी है। जिसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हरे भरे पेड़ और जल से लबालब भरे ताल-तलैया पृथ्वी की सुरक्षा कवच हैं। वर्तमान हीटवेव के भीषण प्रकोप से बचने के लिए, वातावरण में पर्याप्त जल एवं नमी अतिआवश्यक है।


ग्लोबल वार्मिंग की समस्या 97% मानव जनित है, इसमें प्रकृति की भूमिका मात्र 3% है ।अत्यधिक गर्मी, अत्यधिक वर्षा और कड़ाके की ठंढी जैसी दुरुह स्थितियां जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। इसका प्रमुख कारण शहरीकरण और पर्यावरण असंतुलन है। शहरीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई लगातार हो रही है जबकि पौधारोपण कागजी बनकर रह गया है ।पेड़ों की कमी से वातावरण और मिट्टी की आद्रता प्रभावित हो रही है, इससे वाष्पीकरण कम हो रहा है और वर्षा का चक्र अनियमित हो गया है। कहीं अत्यधिक बारिश हो रही है, तो कहीं सूखे की स्थिति बन गई है।


उन्होंने आगे कहा कि सूर्य की जो ऊर्जा पृथ्वी से वापस अंतरिक्ष में जाना चाहिए, उसका आधा हिस्सा भी वापस नहीं लौट पा रहा है। यही वजह है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। जिसका असर सम्पूर्ण प्रमंडल सहित प्रदेश के सभी जिलों में दिख रहा है। बढ़ती गर्मी का दूसरा बड़ा कारण ताल- तलैया का खत्म होना भी है! जल स्रोत कम होने से वाष्पीकरण प्रभावित हो रहा है, जिसका असर वर्षा पर पड़ रहा है ।अतःआमजन से अपील है कि अधिक से अधिक पौधरोपण करें तथा उसको संरक्षित रखें।

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