करवा चौथ जीवन भर प्रेम, विश्वास और समर्पण निभाने का संकल्प है-पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


भारतीय सनातन संस्कृति पर्वों और उत्सवों की एक ऐसी जीवंत श्रृंखला है जो मानवीय संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान करती है। सनातन परम्परा में तिथियों को माता का स्थान प्राप्त है जैसे – तीज माता, चौथ मैया, पंचमी या पांची मैया, छठ मैया इत्यादि । भारत के विविधताओं में स्थान विशेष में विभिन्न तिथियों को भांति भांति प्रकार से मनाया जाता है । सारी तिथियों के अपने अपने देवी देवता हैं । गर्गसंहिता, शिवपुराण, भविष्यपुराण, शिवधर्मोत्तरपुराण, अग्नि पुराण इत्यादि ग्रंथों में व्रत माहात्म्य के साथ साथ इन सबकी कथाएं भी प्राप्त होती हैं । भारत के गांव मान्यताओं और परम्पराओं पर विश्वास करते हैं ये मान्यताएं आगे जाकर श्लोक रूप में परिणत होती हैं और तदुपरान्त श्लोक से शास्त्रसम्मत हो जाती हैं। इसीलिए लोक परंपरा को सबसे प्रथम स्थान प्राप्त होता है । यथा – यद्यपि शुद्धं लोकविरुद्धं न करणीय। किसी भी भारतीय पारंपरिक शास्त्र में कभी भी लोक परंपरा या लोक संस्कृति की आलोचना नहीं प्राप्त होती है । इसी पावन श्रृंखला में करवा चौथ का व्रत आता है। करवाचौथ का व्रत दाम्पत्य जीवन के प्रति अटूट समर्पण, अगाध प्रेम और पवित्र विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व उस भावनात्मक ताने-बाने को सुदृढ़ करता है जहाँ दो आत्माएं एक सूत्र में बंधकर सम्पूर्ण जीवन की यात्रा का निर्वहन करती हैं। यह व्रत स्त्री के आंतरिक संबल और संकल्प शक्ति का परिचायक है, जहाँ भारतीय परंपरा में नारी को गृहस्थी की धुरी माना गया है। करवाचौथ का उपवास उस धीरज और संयम को प्रगट करता है जो परिवार तथा सम्बन्धों की नींव को मजबूत बनाता है। दिनभर निर्जला रहकर संध्या के समय चंद्रोदय की प्रतीक्षा करना धैर्य और निष्ठा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है, क्योंकि चन्द्रमा को मन का कारक माना गया है और चन्द्र दर्शन के माध्यम से यह कामना की जाती है कि दाम्पत्य जीवन में शीतलता, शांति और प्रेम की आभा सदैव बनी रहे। प्रेम कोई संकुचित भावना नहीं है, यह तो दो प्राणों का ऐसा पावन अनुष्ठान है जो समस्त सांसारिक बाधाओं को पार कर अमरत्व को प्राप्त होता है। दाम्पत्य जीवन में सुख-दुःख का सहयात्री होना ही सच्ची साझेदारी है। संस्कृति मर्मज्ञों ने दाम्पत्य प्रेम और पारिवारिक गरिमा को समाज की रीढ़ माना है। इस संदर्भ में सनातन ग्रंथों का यह उद्बोधन अत्यंत प्रासंगिक है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।” एक दूजे के पूरक बनकर जीवनपथ की हर कठिनाई को सहज बना देना ही सच्चे दाम्पत्य का परम धर्म है। करवाचौथ का यह पावन पर्व सामाजिक समरसता और पारिवारिक मूल्यों का उत्कृष्ट संवाहक है, जो हमें यह सिखाता है कि रिश्ते किसी भौतिक लाभ की अपेक्षा आपसी विश्वास, आदर और अगाध स्नेह से पुष्पित होते हैं। आधुनिकता की दौड़ के बीच यह व्रत हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने का एक सशक्त माध्यम है, जो हर गृहस्थी में प्रेम और सौहार्द का अनंत प्रकाश प्रज्वलित करता है।

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