Thursday, February 12, 2026
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पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्राचीन उदाहरण है वटवृक्ष की पूजा -पं-भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने हेतु प्रकृति से जुड़े रहना हर भारतीय के संस्कार में है! हम धरती को मां मानते हैं !प्रकृति को देवता जैसे पूजने की हमारी संस्कृति है। यह सत्य है की प्रकृति की रक्षा के लिए समाज को जागरूक होना होगा प्रकृति ने हर मौसम के हिसाब से पेड़ पौधों की संरचना की है हम अपने व्रत एवं पर्व त्योहार को मनाने के लिए शुद्ध रूप से वृक्षों पर निर्भर है कोई भी ऐसा त्यौहार नहीं है जिसमें पेड़ पौधों का योगदान न हो ।आगामी 26 मई को बट सावित्री अमावस्या के दिन बरगद (वटवृक्ष)की पूजा अर्चना श्रद्धापूर्वक परिवार की महिलाओं द्वारा की जाएगी। वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार भी ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। वट सावित्री व्रत सनातन धर्म की सबसे प्रमुख व्रत परंपराओं में से एक है, जिसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सौभाग्य और समृद्ध जीवन के लिए करती हैं। इस व्रत का वर्णन महाभारत, स्कंद पुराण, और व्रतराज जैसे शास्त्रों में विस्तार से मिलता है। इस दिन स्त्रियां वट वृक्ष की पूजा करती हैं, और इस वर्ष यह पर्व सोमवार, 26 मई को दिन 10/ 54 के बाद मनाया जाएगा क्योंकि 10/54 तक चतुर्दशी तिथि है और उसके बाद अमावस्या लग रहा है इस लिए दिन 10/54 के बाद मनाए।


सौभाग्य प्राप्ति मंत्र वट वृक्ष के समीप बैठकर पढ़ना चाहिए


अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।।
इस मंत्र का अर्थ है, ‘हे सुव्रता देवी! मुझे सौभाग्य, अखंड वैवाहिक जीवन, पुत्र-पौत्रों का सुख और पारिवारिक सुख-शांति प्रदान करें। यह मेरा अर्घ्य स्वीकार करें, आपको मेरा नमन है।’ यह मंत्र पूजा के समय अर्घ्य अर्पण करते हुए बोला जाता है। यह देवी सावित्री की स्तुति है और इससे स्त्री को अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। वट वृक्ष पूजा मंत्र
यथाशाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा ममापि सौभाग्यं वृद्धिं कुर्याद् जनार्दन।।
इस मंत्र का अर्थ है, ‘हे वट वृक्ष! जैसे आप अपनी शाखा-प्रशाखाओं के द्वारा पृथ्वी पर विस्तृत और वृद्ध हो रहे हैं, वैसे ही मेरे सौभाग्य और परिवार में भी वृद्धि हो। यह मंत्र वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय बोला जाता है। इस मंत्र से वृक्ष का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है। वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय “यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा।
सावित्री-सत्यवान मंत्र
सावित्र्यै च नमस्तुभ्यं सत्यवानसहिताय च। दीर्घायुष्यमयं देहि सौभाग्यं मे प्रयच्छ च।।
इस मंत्र से सावित्री और सत्यवान की पूजा करते समय प्रार्थना की जाती है कि वे अपने आदर्श प्रेम, तप और आशीर्वाद से भक्तों को भी सौभाग्य और लंबा जीवन प्रदान करें।

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