‘रक्तदाता समूह’ ने यमुना घाट पर कराया रेखा देवी को मोक्ष_ (मामला उत्तर प्रदेश का)
रमेश ठाकुर – पश्चिम चंपारण, बिहार
दिनांक:- 13-09-2026
रिश्ते जब सामाजिक लोक-लज्जा और पुरानी रंजिशों के बोझ तले दब जाएं, तो इंसानी संवेदनाएं किस कदर दम तोड़ देती हैं, इसकी एक मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाली मिसाल इटावा के सैफई से सामने आई है। अस्पताल के वार्ड में 6 दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद दम तोड़ने वाली 55 वर्षीय रेखा देवी का शव लेने से जब उनके पति, तीन बेटों और यहां तक कि मायके वालों ने भी साफ इंकार कर दिया, तो समाज की बेरुखी पर इंसानियत की जीत हुई। सामाजिक संस्था ‘रक्तदाता समूह’ के सदस्यों ने पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में यमुना तट पर पूर्ण सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया।
अस्पताल में तोड़ा दम, अपनों ने फेरा मुंह
घटनाक्रम की शुरुआत 21 अगस्त 2026 से हुई, जब एम्बुलेंस कर्मियों ने गंभीर स्थिति में रेखा देवी (55) को उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई में भर्ती कराया था। इलाज के दौरान 07 सितंबर 2026 की दोपहर 12:16 बजे रेखा देवी ने अपनी अंतिम सांस ली। मौत की सूचना मिलते ही सैफई थाना पुलिस ने तत्काल उनके पति शिवनाथ, जो कि औरैया जनपद के दिबियापुर थाना क्षेत्र स्थित ग्राम कनमऊ के निवासी हैं, से संपर्क किया। पुलिस और स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि दुख की इस घड़ी में परिवार अपनी पुरानी रंजिशें भूलकर अंतिम दर्शन के लिए पहुंचेगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
15 साल पुराना अतीत बना दूरी की वजह
जब 10 सितंबर तक परिवार का कोई सदस्य अस्पताल नहीं पहुंचा, तो समाजसेवा में सक्रिय ‘रक्तदाता समूह’ की टीम ने कनमऊ गांव के वर्तमान प्रधान अनमोल यादव से संपर्क साधा। प्रधान के माध्यम से पति शिवनाथ और उनके तीनों बेटों—आशीष 30 वर्ष, गोलू 25 वर्ष और राधे 23 वर्ष को समझाने की हर संभव कोशिश की गई, लेकिन बेटों और पति ने मां का शव स्वीकार करने से साफ मना कर दिया। परिजनों का आरोप था कि रेखा देवी लगभग 15 वर्ष पूर्व गांव के ही संजू यादव नाम के एक शादीशुदा व्यक्ति के साथ घर छोड़कर चली गई थीं। कुछ समय पहले संजू की मौत हो गई, जिसके बाद रेखा देवी कहां रहीं और किस स्थिति में रहीं, इसकी जानकारी परिवार को नहीं थी। इसी पुरानी सामाजिक खटास के कारण पति और तीनों बेटों ने रेखा देवी से हमेशा के लिए दूरी बना ली थी। मायके ने भी तोड़ा नाता, फोन बंद कर भागे परिजन संवेदनाओं के टूटने का सिलसिला यहीं नहीं थमा।

जब पति और बेटों ने पल्ला झाड़ लिया, तो संस्था के सदस्यों ने रेखा देवी के मायके पक्ष से संपर्क किया। जालौन जिले के कुठौद थाना क्षेत्र स्थित ग्राम बड़ी मड़ैया में रह रहे उनके पिता महादेव और भाई विजेंद्र को जब बहन की मौत की खबर दी गई, तो उन्होंने भी शव लेने से साफ इंकार कर दिया। इधर, 10 सितंबर को सैफई थाना पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचायतनामा की विधिक प्रक्रिया पूरी की और शव को 72 घंटे के लिए मोर्चरी (शवगृह) में सुरक्षित रखवा दिया। जब दिबियापुर थाना पुलिस परिजनों को तलाशने शिवनाथ के घर पहुंची, तो पति घर के दरवाजे पर ताला लगाकर और फोन स्विच ऑफ करके कहीं गायब हो चुके थे। वहीं, तीनों बेटों ने भी अपने मोबाइल नंबर बंद कर लिए। रेखा देवी के अंतिम संस्कार के दौरान रक्तदाता समूह के संचालक शरद तिवारी ने आखिरी प्रयास किया और रेखा देवी के परिजनों को विडियो कालिंग के जरिए अंतिम संस्कार में शामिल होने का मौका दिया लेकिन परिवार के सदस्यों ने विडियो कालिंग के जरिए भी अंतिम संस्कार देखना पसंद नहीं किया….
खाकी और समाजसेवियों ने निभाया फर्ज
13 सितंबर को कानूनन 72 घंटे की समयावधि पूरी होने के बाद, जब कोई भी विधिक वारिस सामने नहीं आया, तब सैफई पुलिस और समाजसेवियों ने मिलकर रेखा देवी का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। सैफई थाने से महिला कांस्टेबल नीलम यादव एवं होमगार्ड कमलेश कुमार की गरिमामयी मौजूदगी में ‘रक्तदाता समूह’ के समर्पित सदस्यों—
राजीव लोचन दीक्षित, पंकज भदौरिया, विमलेश तिवारी, डा. रोहित तिवारी, राजीव नरुका, राजेश दुबे, गोपाल शुक्ला, आदित्य प्रताप, राजेश, सौरभ परिहार, और शरद तिवारी ने पूरी विधि-विधान और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ इटावा स्थित यमुना घाट पर रेखा देवी के पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार किया।

अपनों के इंतजार में भले ही रेखा देवी की आंखें बंद हो गईं, लेकिन ‘रक्तदाता समूह’ के युवाओं की इस पहल ने यह साबित कर दिया कि जब खून के रिश्ते साथ छोड़ देते हैं, तब भी इंसानियत का रिश्ता हमेशा जीवित रहता है।






