Monday, April 6, 2026
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पूजा -अर्चना में त्रिपुंड अवश्य धारण करें -पं०भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार

बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने पड़री पिपरपाती, पिपरासी में पंडित संजय द्विवेदी के निवास पर महामृत्युंजय महायज्ञ में भाग लेते हुए कहा कि -ललाट अर्थात माथे पर भस्म या चंदन से तीन रेखाएं बनाई जाती हैं इसे त्रिपुंड कहते हैं। हथेली पर चन्दन या भस्म को रखकर तीन अंगुलियों की मदद से माथे पर त्रिपुण्ड को लगाया जाता है। इन तीन रेखाओं में 27 देवताओं का वास होता है। यानी प्रत्येक रेखाओं में 9 देवताओं का वास होता हैं।शिव पुराण के अनुसार जो व्यक्ति नियमित अपने माथे पर भस्म से त्रिपुण्ड यानी तीन रेखाएं सिर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक धारण करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और वह व्यक्ति शिव कृपा का पात्र बन जाता है।विज्ञान ने त्रिपुंड को लगाने या धारण करने के अनेक लाभ बताएं हैं। विज्ञान कहता है कि त्रिपुंड चंदन या भस्म से लगाया जाता है। चंदन और भस्म माथे को शीतलता प्रदान करता है। अधिक मानसिक श्रम करने से विचारक केंद्र में पीड़ा होने लगती है। ऐसे में त्रिपुण्ड ज्ञान-तंतुओं को शीतलता प्रदान करता है।त्रिपुंड में देवताओं का वास है।ललाट पर लगा त्रिपुंड की पहली रेखा में नौ देवताओं का नाम इस प्रकार है।

अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रिया शक्ति, प्रात:स्वन, महादेव। इसी प्रकार त्रिपुंड की दूसरी रेखा में, ऊंकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा, महेश्वर जी का नाम आता है. अंत में त्रिपुंड की तीसरी रेखा में मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीयसवन, शिव जी वास करते हैं। त्रिपुंड धारण करते समययह विचार मन में न रखें कि त्रिपुण्ड केवल माथे पर ही लगाया जाता है। त्रिपुंड हमारे शरीर के कुल 32 अंगों पर लगाया जाता है। इन अंगों में मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, दोनों पाश्र्व भाग, नाभि, दोनों अरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैर शामिल हैं। इनमें अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल और आठ वसुओं वास करते हैं। सभी अंगों का नाम लेकर इनके उचित स्थानों में ही त्रिपुंड लगाना उचित होता है।
अंत में गुरु जी ने कहा कि शास्त्र रक्षण में तत्पर संस्कृत के श्रेष्ठ विद्वान धन्य हैं ,शास्त्र के अनुसार शिखा, यज्ञोपवीत, लांग लगाकर धोतादि वस्त्र और तिलक से सम्पन्न हैं । मुझे प्रसन्नता है कि उपस्थित सभी श्रेष्ठ विद्वान पंडित नीरज शांडिल्य, पंडित उपेंद्र पांडेय, पंडित रामसागर पाठक, पंडित कृपा निधि तिवारी और रौनक कुमार पांडेय प्रतिष्ठित एवं गुरु अनुरागी हैं।

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