Wednesday, March 4, 2026
No menu items!
Google search engine
Home आस पास पारंपरिक फाग को पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है-पं०भरत...

पारंपरिक फाग को पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है-पं०भरत उपाध्याय

0
10

विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने होली मिलन समारोह को संबोधित करते हुए कहा- कि होली का पावन पर्व आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है ! इसे प्रेम और भाईचारे के साथ हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है किंतु बदलते समय के साथ होली का स्वरूप भी बदलता दिख रहा है। पहले बसंत पंचमी से ही फाग गाने वाली टोलियां सक्रिय हो जाती थीं ,ढोलक, झाल और मंजीरे की थाप पर मंदिरों में पूजा अर्चना के बाद पारंपरिक होली गीतों की शुरुआत होती थी। गौरी संग लिए शिव शंकर खेलें फाग– सुनाई देने वाला फगुआ गीत अब पुराने दिनों की बात बनकर रह गया है! यह फाग गीत न केवल होली के आगमन का संदेश देते थे बल्कि गांव में आपसी भाईचारा भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति रिवाज की जीवन में झलक देखने को मिलती थी।

फगुआ गीत लोक संस्कृति की पहचान मानी जाती थी।इसी बहाने लोग गिले शिकवे भुला कर गले मिलते और रिश्तों में नई मिठास घुलती थी। वर्तमान में अब गांव में वह दृश्य कम ही दिखाई देता है। पारंपरिक फाग की जगह डीजे की तेज आवाज और गीतों ने ले ली है। युवा वर्ग घर जाकर रंग खेलने के बजाय डीजे पर नृत्य करता नजर आता है ।इससे त्यौहार की गरिमा प्रभावित हो रही है। आज यह पर्व शराब और अश्लील गीतों के प्रचलन से सामाजिक माहौल को प्रभावित कर दिया है।
इस अवसर पर मानस वक्ता प्रिया प्रियदर्शनी ने कहा कि पहले फगुआ में जो उमंग और आत्मीयता होती थी वह अब कम होती दिख रही है ।यदि पारंपरिक गीतों और सांस्कृतिक मूल्यों को फिर से बढ़ावा दिया जाए तो होली का पुराना रंग और रौनक लौट सकती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

error: Content is protected !!