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वन्य जीव एवं वन संपदा की सुरक्षा को लेकर कार्यशाला के दूसरे दिन कानून आधारित गहन प्रशिक्षण दिया गया

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वाल्मीकि नगर से नंदलाल पटेल की रिपोर्ट

वन्यजीव एवं वन संपदा की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला के दूसरे दिन कानून आधारित गहन प्रशिक्षण दिया गया। इस अवसर पर वन विभाग के रेंज अधिकारियों एवं वनपालों को संयुक्त रूप से वन्यजीव संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रशिक्षण का उद्देश्य वन्यजीव अपराधों की जांच और अभियोजन को प्रभावी बनाना तथा दोषियों को सख्त सजा दिलाने की दिशा में विभागीय क्षमता को सुदृढ़ करना रहा।
कार्यशाला में प्रशिक्षक द्वारा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा भारतीय वन अधिनियम की विभिन्न धाराओं एवं उपधाराओं की विस्तार से व्याख्या की गई। साथ ही वन कानून के अनुभवी विशेषज्ञों ने अपराध से संबंधित कानूनी प्रावधानों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कई मामलों में विवेचकों को धाराओं की समुचित जानकारी न होने के कारण आरोपी कानूनी खामियों का लाभ उठाकर आसानी से छूट जाते हैं। ऐसे में वे पुनः अपराध को अंजाम देते हैं, जिससे वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को गंभीर नुकसान पहुंचता है।


विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यदि विवेचक और विभागीय अधिकारी कानून की सही समझ के साथ जांच करें, साक्ष्यों को मजबूत तरीके से प्रस्तुत करें और उचित धाराओं का प्रयोग करें, तो आरोपी का बच निकलना मुश्किल हो जाता है। प्रशिक्षण के दौरान शिकार, वन्यजीवों की तस्करी, वन्यजीवों के अंगों की अवैध खरीद-फरोख्त, वन उपज की तस्करी, अवैध पातन, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास से छेड़छाड़ अथवा उन्हें नष्ट करने जैसे अपराधों पर लगाई जाने वाली धाराओं की व्याख्या उदाहरणों के साथ की गई।
इसके अलावा शिकारी से बरामद वाहनों, अस्त्र-शस्त्र, आग्नेयास्त्र और अन्य उपकरणों पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों की भी विस्तार से जानकारी दी गई। प्रशिक्षण में यह बताया गया कि जब्ती, सीलिंग, साक्ष्य संकलन और केस डायरी तैयार करने में किस प्रकार की सावधानियां बरतनी चाहिए, ताकि मामला न्यायालय में मजबूत रूप से प्रस्तुत किया जा सके।


इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, वन संरक्षण नियम, 1997, शस्त्र अधिनियम, 1959, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, भारतीय दंड संहिता एवं आपराधिक प्रक्रिया संहिता के उन प्रावधानों से अवगत कराना था, जो राज्य में वन्यजीवों के संरक्षण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। साथ ही अग्रिम पंक्ति के वन कर्मचारियों को इन अधिनियमों के तहत प्राप्त शक्तियों और वन्यजीव अपराध की जांच के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में भी मार्गदर्शन दिया गया।
प्रशिक्षण के माध्यम से वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की बारीकियों और उसके महत्व को समझने में प्रतिभागियों को विशेष मदद मिली। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण से न केवल जांच की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि मजबूत केस तैयार कर दोषियों को सजा दिलाने में भी सफलता मिलेगी। यह कार्यशाला वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम साबित होगी।

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