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वाल्मीकिनगर में मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी संगम में उमड़ा आस्था का सैलाब

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बाल्मीकि नगर से नंदलाल पटेल की रिपोर्ट


वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण)। माघ महीने की पावन मौनी अमावस्या पर वाल्मीकिनगर स्थित गंडक–नारायणी नदी के त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। अहले सुबह से ही श्रद्धालु पवित्र स्नान और पूजा-अर्चना के लिए संगम तट पर पहुंचने लगे। सीमा क्षेत्र में स्थित यह पवित्र स्थल, जहां गंडक, तमसा और सोनहा नदियों का संगम होता है, माघ मास के दौरान प्रमुख तीर्थ के रूप में जाना जाता है। इस अवसर पर तीन दिनों तक चलने वाला विशाल मेला भी लगा है।


मेले में संतरे, इलायची और तेजपत्ता की विशेष मांग देखने को मिली। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के पडरौना निवासी नरेंद्र कौशिक अपनी पत्नी सुधा और बच्चों के साथ शनिवार देर रात वाल्मीकिनगर पहुंचे। उन्होंने बताया, “भीड़ बढ़ने से पहले शांति से धार्मिक अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से हम सुबह करीब 2.30 बजे संगम तट पहुंच गए। त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद पूजा की और मौनी अमावस्या की परंपरा के अनुसार चावल, तिल और गाय का दान किया।

इसके बाद उन्होंने वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व क्षेत्र स्थित जटाशंकर मंदिर और नर देवी माता मंदिर में भी दर्शन-पूजन किया।
नेपाल से आए श्रद्धालु कृष्ण थापा ने परिवार की सेहत और खुशहाली की कामना की। चावल, तिल और सब्जियों से भरा पीतल का पात्र हाथ में लिए उन्होंने कहा, “मान्यता है कि त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।”


स्थानीय पुजारी हरे कृष्ण मिश्रा ने बताया कि मौनी अमावस्या पर मौन रहकर स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन किसी के प्रति बुरा न बोलना भी मौन के समान माना जाता है। स्नान के बाद छाता, बिस्तर-बिछावन, गाय और सोने के दान की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मौनी अमावस्या पर संगम स्नान से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना सतयुग में तपस्या, त्रेता में ज्ञान और द्वापर में भक्ति से प्राप्त होता है। पितरों के लिए तर्पण करने से उनके आशीर्वाद के साथ मोक्ष की प्राप्ति का भी विश्वास है।

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