देश पहले तथा संविधान सर्वोपरि : सुनिल कुमार
विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार
भारत जैसे विविधतपूर्ण लोकतांत्रिक देश की राष्ट्रीयता, एकता, सहिष्णुता, सद्भाव को कुछ कुत्सित विचाधारा से प्रभावित किया जा रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है।
कुछ धार्मिक व्यक्ति टीवी डिबेट में या अन्य अवसरों पर अपने-अपने धर्म को देश से बड़ा तथा अपनी धार्मिक पुस्तक को देश के संविधान से उपर बता रहे हैं जो सर्वदा अनुचित लगता है क्योंकि देश धर्मों से पहले तथा संविधान सर्वोपरि, सर्वोच्च विधान है।
हमारे महापुरुषों ने भी देश को सबसे पहले और संविधान को सबसे उपर माना है। विभिन्न मामलों में जब धार्मिक विवाद आदि की समस्या उत्पन्न होती है तो संविधान के दायरे में ही उनका निराकरण होता है। जो संविधान की महत्ता, प्रासंगिकता को स्पष्ट करती है। यह बात उन लोगों को समझनी चाहिए।
इसलिए देश और संविधान को सबसे पहले रखना देश की एकता, अखंडता, सौहार्द के लिए आवश्यक है।
उक्त विचार स्थानीय शिक्षक सुनिल कुमार ने सोशल मीडिया में वायरल खबरों पर प्रतिक्रिया स्वरूप व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारत विश्व के अन्य देशों से अलग, विविधतापूर्ण तथा अद्वितीय है। यहाँ सभी धर्मों के लोग रहते हैं। भौगोलिक, भाषायी, धार्मिक विविधता भारत की पहचान है।
जो लोग धर्मों को देश से उपर मानते हैं वे कहीं न कहीं अपनी देशभक्ति को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं जो चिंतनीय हैं। और ऐसे लोग समाज के आदर्श नहीं हो सकते।
कानून, सरकार, न्यायालय को इस पर संज्ञान लेते हुए उचित कदम उठाने चाहिए। कानून बनाने चाहिए ताकि देश की समप्रभुता, राष्ट्रीयता, एकता व अखंडता प्रभावित न हो।
मालूम हो कि भारत में संविधान सर्वोच्च विधान है, क्योंकि यह देश का सर्वोच्च कानून है, जो सरकार के सभी अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) के लिए मौलिक ढांचा तय करता है, नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है, और किसी भी कानून या सरकारी कार्य को असंवैधानिक होने पर रद्द करने की शक्ति न्यायपालिका को देता है, जिससे भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित होता है।
“धर्म से बड़ा है देश” यह एक लोकप्रिय भावना है जो देश के प्रति निष्ठा को धर्म से ऊपर रखने की वकालत करती है, खासकर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहाँ देश की एकता और अखंडता सर्वोपरि है; कई लोगों का मानना है कि धर्म हमें बाँट सकता है, जबकि राष्ट्र हमें जोड़ता है, इसलिए राष्ट्रधर्म (देश के प्रति कर्तव्य) का पालन करना महत्वपूर्ण है, भले ही यह व्यक्तिगत आस्था से अलग हो, क्योंकि एक मजबूत राष्ट्र ही धर्मों और नागरिकों की रक्षा कर सकता है।






