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वृद्धावस्था की गरिमा को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है -पं-भरत उपाध्याय

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विजय कुमार शर्मा बगहा पश्चिम चंपारण, बिहार


बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज मधुबनी के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने पेंशनर समाज को संबोधित करते हुए कहा कि “न संघर्ष खत्म होता है और न ही शिकायतें,जो खत्म हो रही है, वो है उम्र! इस लिए उम्र की हिफाजत बहुत जरूरी है।
रिटायरमेंट के बाद का जीवन अक्सर एक गहन आत्मचिंतन का दौर बन जाता है। नौकरी की भागदौड़ थम जाती है, दैनिक रूटीन गायब हो जाता है, और शांत घर की चार दीवारें सन्नाटे की गूंज से भर जाती हैं। इस खालीपन में व्यक्ति खुद से सवाल करने लगता है—मैं कौन हूँ? यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की एक सार्वभौमिक व्यथा है। जीवन के उत्तरार्ध में भौतिक उपलब्धियों का जश्न फीका पड़ जाता है, औरआध्यात्मिक खोज उभरती है। भारतीय संदर्भ में यह और भी प्रासंगिक है, जहाँ वृद्धावस्था को ‘वानप्रस्थ’ का चरण माना जाता है—जहाँ मनुष्य प्रकृति से संवाद करता है और अपनी सच्ची पहचान तलाशता है।
जीवन भर की मेहनत के बाद व्यक्ति खुद को कैद महसूस करता है। घर बनाए, खेत जोते, छोटे-बड़े व्यवसायों में निवेश किया—फिर भी अब चार साधारण दीवारें बेड़ियाँ लगती हैं। युवावस्था में साइकिल से मोपेड, बाइक से कार तक की दौड़ लगाई। राज्य, देश, महाद्वीप घूमे। लेकिन रिटायरमेंट के बाद यात्राएँ ड्रॉइंग रूम से किचन तक सिमट जाती हैं। यह बदलाव शारीरिक कम, मानसिक अधिक है। गति और स्टाइल का पीछा करने वाला व्यक्ति अब धीरे-धीरे चलता है, अकेला अपने कमरे में। प्रकृति का आह्वान यहां महत्वपूर्ण हो जाता है। वह मुस्कुराकर पूछती है, “तुम कौन हो?” और उत्तर सरल होता है—”बस मैं हूँ।” यह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की याद दिलाता है, उपनिषदों का वह सिद्धांत जहाँ व्यक्ति ब्रह्म का अंश पहचानता है।सांस्कृतिक और पारिवारिक बदलाव इस खोज को और गहरा बनाते हैं। पहले जन्मदिन, सगाई, शादियाँ धूमधाम से मनाईं। लेकिन अब प्राथमिकताएँ बदल गईं—अच्छी नींद और भूख का इंतजार। सोना, चाँदी, हीरे लॉकर में सो रहे हैं;सूट-ब्लेजर अलमारी में लटके हैं। मुलायम कॉटन के साधारण कपड़े आजादी का प्रतीक बन जाते हैं। इंग्लिश में महारत हासिल की, लेकिन अब मातृभाषा में बात करने से सुकून मिलता है। यात्राओं के फायदे-नुकसान यादों में तौले जाते हैं। व्यवसाय चलाए, परिवार पाला, रिश्ते जोड़े—फिर भी अब सबसे करीबी पड़ोसी का दयालु चेहरा है। यह एकाकीपन आधुनिक भारत की कड़वी सच्चाई है। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, 65 वर्ष से ऊपर के 20% से अधिक बुजुर्ग अकेले रहते हैं, और परिवारों में भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। शहरीकरण और नाभिकीय परिवारों ने पारंपरिक संयुक्त परिवार को कमजोर कर दिया है।फिर भी, यह दौर निराशा का नहीं, पुनरावलोकन का है। व्यक्ति समझता है कि नियमों का पालन, पढ़ाई की मेहनत सब व्यर्थ नहीं—बल्कि सच्चे मूल्यों की नींव हैं। अच्छी सोच, परिवार और प्यार ही जीवन का सार हैं।भगवद्गीता का’कर्मण्येवाधिकारस्ते’ यहां प्रासंगिक लगता है—कर्म किए बिना फल की चिंता न करो। रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति धरती को गरिमा से छूता है, आसमान में उड़ान भरने की बजाय। यह आखिरी यात्रा की तैयारी नहीं, बल्कि सच्चे मानव बनने का मौका है। समाज को इस चरण को सम्मान देना होगा। सरकारी योजनाएँ जैसे ‘राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम’ और ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना’ चालू हैं, लेकिन भावनात्मक समर्थन की कमी है। समुदाय-आधारित केंद्र, योग और ध्यान शिविर बुजुर्गों को नई ऊर्जा दे सकते हैं। उत्तर भारत में, जहाँ संयुक्त परिवार अभी भी जीवित हैं, इनकी भूमिका और महत्वपूर्ण है।*
वृद्धावस्था की गरिमा को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। वे केवल ‘सीनियर्स’ नहीं, अनुभव के भंडार हैं। उनकी कहानियाँ युवाओं को दिशा दे सकती हैं। कृषि नीतियों पर उनकी अंतर्दृष्टि, सामाजिक कल्याण पर सलाह अमूल्य है। क्या हम उन्हें अलग-थलग करेंगे, या उनकी आत्माकी फुसफुसाहट सुनेंगे? प्यार, ताकत और शांति की शुभकामनाएँ सभी वरिष्ठ नागरिकों को। उनकी यात्रा हमारी यात्रा है—प्रकृति से एकाकार होने की।

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