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स्कूली बच्चों से कराई जा रही सफाई, स्वच्छता अभियान और पर्यावरण संरक्षण पर उठे सवाल

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गोपालगंज बिहार से मंजेश पांडे की रिपोर्ट

विजयीपुर /गोपालगंज, बिहार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के गृह प्रखंड विजयीपुर के मुसहरी बाजार स्थित विद्यालय का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे “स्वच्छता पखवाड़ा” के नाम पर सड़क किनारे की गंदगी साफ करते दिख रहे हैं। यह दृश्य न केवल चिंताजनक है बल्कि पंचायत एवं शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

जहां एक ओर पंचायतों में सफाईकर्मी नियुक्त किए गए हैं, वहीं सवाल उठता है कि जब विद्यालय में सफाईकर्मी उपलब्ध नहीं हैं तो क्या पंचायत कर्मियों को इस काम में लगाया नहीं जा सकता था? विडंबना यह है कि बिहार सहित पूरे देश में स्वच्छता अभियान के नाम पर करोड़ों रुपये बैनर, पोस्टर और होर्डिंग्स पर खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बच्चों से ही कूड़ा-कचरा साफ कराया जा रहा है। वीडियो में दिख रहे बच्चे राजकीय मध्य विद्यालय मुसहरी के छात्र हैं जो कि सूबे के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के निर्वाचन क्षेत्र भोरे विधानसभा के विजयीपुर प्रखंड के अंतर्गत आता है । बड़ा सवाल यह है कि जब शिक्षा मंत्री के क्षेत्र में उनके गृह प्रखंड में छात्रों की स्थिति ऐसी है तो फिर बाकि जगहों पर कैसी होगी ? वीडियो में स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है कि प्रधानाध्यापक विनोद सिंह स्वयं खड़े होकर बच्चों से कुदाल और फावड़े से सड़क किनारे सफाई करवा रहे हैं । इलाके में यह भी चर्चा का विषय है कि प्रधानाध्यापक विनोद सिंह की गिनती शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के करीबियों में होती है इसलिए उनकी मनमानीयों पर लगाम लगाने की हिम्मत संभवतः किसी में नहीं है इस विषयक हमने प्रधानाध्यापक एवं स्थानीय बीइओ से उनका पक्ष जानने के लिए सम्पर्क करना चाहा लेकिन अब तक उनसे कोई सम्पर्क नहीं हो पाया है ।

लोगों का कहना है कि क्या किसी शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी को अपने बच्चों के हाथों में कुदाल और गंदगी उठाते देखना स्वीकार होगा? अगर नहीं, तो गरीब बच्चों को ही क्यों शिक्षा की जगह इस तरह के कामों में झोंका जा रहा है? प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी से जब इस विषय पर टेलिफोनिक संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि मुझे कोई इस विषय पर कोई जानकारी नहीं है?

इसी बीच एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है—आम लोगों से अपील की जाती है कि वे अपनी माँ के नाम पर एक पेड़ लगाएँ और पर्यावरण की रक्षा करें, लेकिन दूसरी तरफ कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुँचाने के लिए लाखों पेड़ों की बलि चढ़ा दी जाती है। हाल ही में आडानी परियोजना के नाम पर 10 लाख से अधिक पेड़ काटे जाने की चर्चा ने पूरे अभियान की सच्चाई उजागर कर दी है।

यह वायरल वीडियो केवल विद्यालय प्रशासन पर ही नहीं, बल्कि लोहिया स्वच्छता अभियान और स्वच्छ भारत मिशन पार्ट-2 जैसे सरकारी अभियानों के साथ-साथ पर्यावरण बचाने के दावों पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है।

सवाल सीधा है – गरीब बच्चों और आम जनता से ही बलिदान क्यों? स्वच्छता और हरियाली के नाम पर दिखावा या सच में बदलाव?

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